Posts

मालिनी लेखक- रघुनन्दन महापात्र धर्मदास अपनी दोनों औलादों पर जान छिड़कते हैं। आराधना भी पिता से मोह रखती है। यहाँ तक कि वह पिता को छोड़कर जाना पड़ेगा, इसी खयाल से शादी के लिए राजी नहीं होती थी, मगर आखिरकार चार बातें सोच कर शादी कर लेती है। छोटी, मालिनी ग्यारहवीं में है। पढ़ाई में होशियार है और दुनियादारी भी कुछ कुछ समझती है। माता पिता की कुर्बानियों की अहमियत को वह समझती है और प्रतिदान में उसे क्या क्या करना है उसकी एक लम्बी फ़हरिस्त है जिसे याद करके अपने मुरझाए हुए जोश को ताज़ा कर लेती है।   ललिता, धर्मदास की पत्नी, कक्षा दूसरी तक पढ़ी हैं लेकिन उनको भागवत कथा पढ़ना आता है और रोज़ संध्या बेला में पड़ोस के 10-12 औरतें बुढ़े कथा सुनने उनके घर के प्रांगण में बैठते हैं। मालिनी भी सप्ताह में दो एक दिन श्रोताओं में बैठ जाती है।   धर्मदास के स्कूल के दिनों का सहपाठी गोलक बिहारी, जो एक परचून की दुकान चलाता है। दुकान उसकी कस्बे के बीचों-बीच है, आमदनी ऐसी कि दो और परिवार चला सकता है। जब धर्मदास को अपनी दुकान के सामने से गुज़रते देखता है तो बेफ़िक्री अंदाज में आवाज़ लगा देता है —   ...
  रूमानियत लेखक- रघुनन्दन महापात्र   पौने आठ हो गया। और आधा घंटा बीते तो चलूं। अमूमन ऐसा होता है कि जब हम चाहते हैं कि समय जल्दी कटे कटता ही नहीं। इंतजार के पल धीरे गुजरते हैं। कम्बख्त यही आधा घंटा मुझको अभी आधा दिन की तरह लगने वाला है। पता था मुझको कि इतने में मेरे कपड़े भी धुल जाएंगे और कमरे में झाडू भी लगा लूंगा पर मन नहीं माना। मैं कोई गुंजाइश नहीं रखना चाहता था कि टाइम ज़रा भी लेट हो। तैयार तो मैं साढ़े सात बजे से हो गया था। काम में रत्ती भर का मन नहीं बावजूद उसके कुछ कुछ करने लगा, ऐसे मुर्दों की तरह हाथ पांव पत्थर कर के तो नहीं बैठ सकता था तो टेबील सजाने लगा, देखते देखते पूरा कमरा सज गया। सिर उठाया तो अभी भी दस मिनट बचे हैं। शीशे को पहले से इतना देख चुका था कि अब और देखना मतलब अपने में किसी कमी को जबरन ढूंढने जैसा है जो कि इस मामले में कतई कॉन्फिडेंस गिराता है। यका यक याद आया कि रूमाल में परफ्यूम तो लगाया ही नहीं, फिर वो लगाया,अब तक मैं पूरी तरह तैयार हो गया था और मन ही मन सोच रहा था कि जब दूल्हा बनूंगा तब भी शायद इससे कम वक्त लूंगा। मन इतना उतावला हो रहा था ...
  इंतजार लेखक- रघुनन्दन महापात्र       "अरी! तुम कब सोओगी" "बस थोड़ी देर बाद, ये कुछ सिलाई बची है, तुम सो जाओ" प्रभु! कल एक दिन अच्छा बीते, कह कर बूढ़ा गोविंद सो गया। अभी वृंदा दो घंटे का काम लेकर बैठी है। सवेरा हुआ। झटपट कुछ निपटा कर गोविंद शहर जाने को तैयार हो गया है। इतने में आवाज़ आई..   "जाते जाते भोलेनाथ के लिए भोग देते जाना पूजारी जी को, पन्नी में रख दिया है सिलबट्टे के ऊपर वाले ताक में हैं" "क्यों? तुम नहीं जा रही आज?" "कल रात लम्बे समय तक लगातार बैठ गई, तो ऐसा लग रहा मानो कोई जालिम कमर की हड्डी पर लोहे का कील ठोंक रहा है।" "अच्छा! आराम कर लो। मैं आते समय पीसी हुई हल्दी ले आऊंगा, इस बार नहीं पीसना पड़ेगा तुम्हें।" "हाँ, वो तुम्हारे भत्ते का भी पूछ आना, कब तक बढ़वा देंगे।" "उसी के लिए तो जा रहा हूं खास" "अस्सी के हुए आठ महीने हो गए, पहले से ये लोग करा देते तो आठ महीने के पाँच पाँच सौ ज्यादा मिलते, अब अगर आना कानी करें तो पलथी मार बैठ जाना, जब काम कुछ आगे बढ़े ...
Image
  समकालीन कविता और कवि वेणुगोपाल की काव्यदृष्टि लेखक- रघुनन्दन महापात्र   कथ्य की दृष्टि से जीवन की विविधतापूर्ण दैनन्दिन परिस्थितियों के प्रति सजग व्यक्ति की भाषाई संवेदनात्मक प्रतिक्रिया समकालीन कविता का एक ज़रूरी शर्त है। समकालीन कविता किसी खास विचारधारा से संपृक्त नहीं है बल्कि संश्लेषित भावों तथा विविध प्रवृत्तियों का एक समुच्चय है जो इस कविता को खड़ी करती है। “ समकालीन कविता यथार्थ के धरातल पर सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में आत्मचेतस व्यक्ति की भाषागत संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है, जो जीवन-संघर्ष में विभिन्न रागात्मक बोधों व मानव मूल्यों, मानवाधिकार के सृजनात्मक पक्ष की पहल ही नहीं करती है, बल्कि प्रतिबद्ध रूप से सामाजिक विकास के वर्गहीन सौन्दर्यात्मक संसार की पक्षधर भी है। ” (1) अब तक की लगभग सभी हिन्दी काव्यधारा के विपरीत किसी विशेष भावधारा से या किसी खास आन्दोलन से समकालीन कविता शुरू नहीं हुई है। लगातार घटनाएँ इसको एक खास तरह की बनाने के लिए अपना योगदान देती आईं हैं। और ये घटनाएँ अलग-अलग समय में घटती हैं इसलिए समकालीन कविता की शुरूआत को लेकर एक द्वन्द्...
  समकालीन हिन्दी कविता के सन्दर्भ में समकालीनता लेखक- रघुनन्दन महापात्र   वह कविता जिसमें जीवन की विविधतापूर्ण परिस्थितियों के प्रति सामाजिक,आर्थिक, राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में सजग व्यक्ति की भाषागत संवेदनात्मक प्रतिक्रिया होती है वह समकालीन कविता है। जब हम साहित्य इतिहास के किसी युग को रीतिकाल या आधुनिक काल के रूप में पृथक करते हैं तो आखिरकार हम रीति या आधुनिकता जैसे किसी संबंध-सुत्र के ज़रिए कुछ समकालीन रचनाकारों को ही इकट्ठा करते हैं और उनको हम उनके जीवनकाल से नहीं अपितु उनकी रचनाओं की प्रवृत्तियों से निर्धारित करते हैं। डॉ रवीन्द्र भ्रमर ‘ समकालीन ’ शब्द के तीन अर्थ कहते हैं—एक तो काल विशेष से संबद्ध, दूसरे व्यक्ति विशेष के काल-यापन से संबद्ध और तीसरे साहित्य समाज अथवा प्रवृत्ति विशेष से संश्लिष्ट कालखण्ड़। ( 1 ) इनमें से अगर प्रवृत्ति के आधार पर समकालीन की बात करें तो समकालीनता की परिधि और चौड़ी हो जाती है। कुछ कुछ स्तरों पर निराला जैसे कवि भी समकालीन प्रमाणित किए जा सकते हैं। काल विशेष के आधार पर मोहम्मद रफी और अज्ञेय की चर्चा हो सकती है। समकालीन कविता का मूल आधार...