धर्मदास अपनी दोनों
औलादों पर जान छिड़कते हैं। आराधना भी पिता से मोह रखती है। यहाँ तक कि वह पिता को
छोड़कर जाना पड़ेगा, इसी खयाल से शादी के लिए राजी नहीं होती थी, मगर आखिरकार चार बातें
सोच कर शादी कर लेती है। छोटी, मालिनी ग्यारहवीं में है। पढ़ाई में होशियार है और दुनियादारी
भी कुछ कुछ समझती है। माता पिता की कुर्बानियों की अहमियत को वह समझती है और प्रतिदान
में उसे क्या क्या करना है उसकी एक लम्बी फ़हरिस्त है जिसे याद करके अपने मुरझाए हुए
जोश को ताज़ा कर लेती है।
ललिता, धर्मदास की
पत्नी, कक्षा दूसरी तक पढ़ी हैं लेकिन उनको भागवत कथा पढ़ना आता है और रोज़ संध्या
बेला में पड़ोस के 10-12 औरतें बुढ़े कथा सुनने उनके घर के प्रांगण में बैठते हैं।
मालिनी भी सप्ताह में दो एक दिन श्रोताओं में बैठ जाती है।
धर्मदास के स्कूल
के दिनों का सहपाठी गोलक बिहारी, जो एक परचून की दुकान चलाता है। दुकान उसकी कस्बे
के बीचों-बीच है, आमदनी ऐसी कि दो और परिवार चला सकता है। जब धर्मदास को अपनी दुकान
के सामने से गुज़रते देखता है तो बेफ़िक्री अंदाज में आवाज़ लगा देता है —
"धरम भाई….ई..ई…."
ये 'ई' तब तक उच्चरित
होता रहता है जब तक दूसरे से कुछ जवाब न आ जाए। आवाज़ की तेजी से मेहमान की हैसियत
का अंदाज करते हुए खरीदार दुकान की तीन में से दो छोटी सीढियाँ नीचे उतर आते हैं और
किनारे हट जाते हैं जैसे कोई बड़ा अफसर आ रहा है। मगर नहीं ये तो गोलक बिहारी की फ़क़त
आवाज की करामात है। खैर, दूसरा तो नजर के दायरे से निकल चुका होता है मगर उनकी आवाज
की लय टूटती नहीं। सामने से उत्तर आता है तो एक पल का दसवां भाग रुक कर धीरे से
"आइए… आइए.." बोलता है। इसमें पता ये नहीं चलता कि उस मेहमान के लिए ये कहा
गया है या उन खरीदारों के लिए है जो किसी अफसर के आने की शंका से दो सीढ़ी उतर गए थे।
खैर, अपनी साइकिल घूमा कर धर्मदास बाबू, गोलक की दुकान की सिरी बढ़ाने आ गए और सामने
रखी कुर्सी पर बैठ गए। जल्दी जल्दी ग्राहकों को रवाना कर गोलक, धर्मदास के मज़े लेने
के लिए तैयार हो जाता है।
"धरम भाई। कहाँ भागे चले जा रहे थे?"
"एक ही दिन की तो छुट्टी रहती है, उसी में सब
देखना पड़ता है। …और अपनी बताओ।"
"मैं क्या बताऊं, मुझे तो आपकी चिंता। आप इस
दहेज़ में मिली साइकिल की रूह कब तक कल्पाते रहेंगे। एक इस्कूटर ले आइए।"
इतना ही धर्मदास
को भड़काने के लिए काफी था। साइकिल के लिए उनका लगाव कुछ इस तरह से था कि कोई भी कह
देगा कि उन्होंने साइकिल के लिए शादी की होगी। तुरंत खड़े हो गए और बोले —
"देखिए गोलू भाई मैं आपसे एक बात अर्ज करूं
कि इस तरह के बयानात से परहेज़ कीजिए क्योंकि मुझे इससे तमीज का दामन थामें रहने में
दिक्कत पेश आती है।"
और यह कह के चलने
लगे तो वह कहता है —
"चाय तो पी लीजिए धरम भाई।"
"बहुत मेहरबानी, चाय आप पीजिए।" और अपनी
राह ली।
लड़कियों पे खर्च
करते थे मगर खुद पर नहीं। कुल तीन कुर्ते हैं और सभी में दो एक रफ़ू तो हैं ही हैं।
पिछले साल साली की शादी में शगुन के एक जोड़ी कपड़े और सम्बलपुरी धोती मिले थे मगर
उन्होंने उसे अब तक खोल कर एक नज़र देखा भी नहीं है और वही रफ़ू लगे धोती कपड़े पहन
रहे हैं। और मजाल है जो कोई कह दे कि ये रफ़ू किए हुए कपड़े क्यों पहन रहे हैं। इस
पर अब तक जितना ज्ञान बटोरा है सब समझा देंगे और गुस्सा जो करेंगे सो अलग।
दो सप्ताह में स्कूल
में वार्षिकोत्सव की तैयारियां; डांस गाना वगैरह शुरू हो जाएंगी। जब से ये ख़बर सुनी
है मालिनी बहुत उत्साहित रहती है कि अपने माँ बाबूजी को स्कूल के फंक्शन में ले जाने
का मौका मिलेगा। चार महीने बाद है वार्षिकोत्सव। उसने चुन लिया है कि वह क्या गाएगी
और उस गाने को अपने पिता को डेडिकेट करेगी। तालियों की गड़गड़ाहट से ऑडिटोरियम गुंज
उठेगा और अपने बाबूजी को वो उस खुशी का एहसास कराएगी जो उन्हें याद रहेगा।
मालिनी का उत्साह
दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। आखिर वो दिन आ जाता है। मालिनी और उसके माँ बाबूजी स्कूल
फंक्शन में जाने के लिए तैयार हो रहे हैं।
ललिता कहती है-
"अजी आप अभी तक कपड़े नहीं बदले हैं?"
"कौन से कपड़े?"
"ये नए वाले, इधर बिस्तर पर रखे हैं न।"
"और ये जो मैं पहना हूं। इसमें मैं तुम्हारा
पति नहीं लगूंगा क्या?"
"बच्ची को अच्छा लगेगा। एक दिन के लिए पहन
लीजिए ना।"
जब माँ बोलती है
मालिनी कि आंखें आशा से बड़ी बड़ी हो जाती हैं और फिर पिता की सैद्धांतिक बातें सुनकर
नाउम्मीदी से झुक जाती हैं।
धर्मदास
फिर आगे कहते हैं —
"इन कपड़ों में तुम्हारा नौकर तो नहीं लगूंगा?"
ये सुनकर दोनों ख़ामोश
हो रहते हैं। मगर यह बहस मालिनी पर अपना असर छोड़ता है। वो सोचने लगती है कि इन पुराने
कपड़ों में बाबूजी जाएंगे तो उसे बुरा लगेगा। शर्मींदगी महसूस होगी। सब मन मन हंसेंगे।
अपने दोस्तों से कैसे मिलवाएगी, उसे तो लाज आएगी। बहुत संभावना है कि कोई बाबूजी से
इन कपड़ों के बारे में कुछ कह दे तो …। महफ़िल में पुरा वक्त यह डर बना रहेगा, ऐसे
में कैसे होगा। इसी उधेड़बुन में वो आखिर में यह सोचती है कि बाबूजी महफ़िल में न जाएं
तो ही मुनासिब होगा। मगर उस सपने का क्या जो वो उस दिन से देखती आ रही है जब उसने इस
वार्षिकोत्सव के बारे में पहली बार जाना और उन तमाम बातों का क्या जो वो अपने दोस्तों
को कह चुकी है कि वह महफ़िल में क्या क्या करने वाली है। उसका मन भारी होने लगता है।
यही सब सोचते हुए कुर्सी से उठती है और बाथरूम चली जाती है। आंखों से आंसू उतर कर उसके
गाल भीज जाते हैं। जब वो दर्पण में आप को रोती हुई देख लेती है तब भावनाओं से ज्यादा
जकड़ जाती है और तब निचला होंठ थरथराने लगता है, उसे एहसास हो जाता है कि वो ज़ार-ज़ार
रो पड़ेगी, आवाज़ मुँह से निकल आएगी। बाथरूम से आवाज़ बाहर आ जाएगी, इसी खयाल से दोनों
हाथों से मुँह को जोर से ढाप लेती है। थोड़े ही पल में खुद के उपर नियंत्रण पाते हुए
मुँह खोल कर दो तीन लम्बी लम्बी सांसें लेती है और जल्द ही खुद को सम्भाल लेती है।
ऐसे में उपाय सुझता कि गुसलखाने से निकलकर उसे बुख़ार आने का अभिनय करेगी और तीनों
ही न जाएंगे फंक्शन में। यही सोचते सोचते वो एहसास करती है कि उसे वाकई में बुखार हो
गया है।
Badhiyaaa hai
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