प्रवेशिका


लेखक- रघुनन्दन महापात्र

अभिनव तेज़ तेज़ कदम बढ़ाते हुए चला जा रहा है। कोहरा अभी भी है। दो कोस तकरीबन चलने के बाद तिरंगा दिख पड़ा। बीस मिनट में स्टेशन आ जाएगा। भले एक आध घंटे बाद ही लोग आना शुरू करें पर जैसे भी मुझे कतार में सबसे आगे खड़ा हो जाना है। वहाँ पहुंच कर पानी पीता रहूंगा, नहीं इस दो मिनट के लिए कतार में दो लोगों के पीछे रह जाऊंगा। ऐसे तो फिर टिकट मिलने से रहा। सीट न मिलेगी तो सफ़र मुहाल हो जाएगा मेरे लिए। इन्हीं सब बातें सोचते हुए पहुंच गया स्टेशन।

 

टिकट हो गया, खुशी मन घर लौटा। कल जाने की तैयारी करने लगा।

 

दो दिन और एक रात चलने के बाद गाड़ी पहुंची राजधानी। आधे घड़ी का उजाला अभी आकाश में बाकी है। स्टेशन से बाहर सड़क के दोनों ओर गुड़हल के पेड़ लगे हैं। गाढ़े हरे रंग के पत्तों में कहीं कहीं दो एक सुर्ख़ गुड़हल और उन पर बेमौसम हल्के छींटों के बदौलत लटकती बूँदें शाम के नज़ारे को सवेरे सी ताजगी और सौरभ दे रहे थे। धीरे धीरे अंधेरा हो गया। अभिनव अपने साल भर पुराने मित्र के पते पर चला।

 

अभिनव का मित्र वनवासी उसे आधे रास्ते लेने आया था। दोनों साथ चले। कमरे में पहुंच कर सौजन्य की दो बातें हुईं। फिर थोड़ी देर बाद खाना पकाते हुए वनवासी ने पुछा — कुछ बात वात किए हो किसी से?

 

"हाँ यार, ये भी क्या बाकी है? बात के बगैर भी और बातें करके भी दोनों देख लिया दो सालों में, पर इस बार थोड़ी उम्मीद है"

 

"जाहिर है, तभी इतनी दूर से आए हो। पर किससे बात हुई क्या बात की, कहो तो!"

 

"प्रोफेसर गवाक्ष जी से बात की है।"

 

"अच्छा पूरी कैफियत कह जाओ।"

 

"कहा मैंने, कि सर ये तीसरा साल है मैं लगातार प्रयास कर रहा हूं पर पता नहीं मेरा चयन क्यों नहीं हो रहा, विषय मेरा सही है स्कालरशिप भी है फिर भी.. तो सर ने मेरा विषय सुना और कहा; कि विषय ठीक है इस बार आओ हो जाएगा और तारीख से पहले एक बार विभाग आने के लिए ताकीद की।"

 

"आए थे?"

 

बुझे हुए मन से अभिनव ने जवाब दिया— हाँ, आया था और मिला भी, पर मुझे तुष्टि नहीं हुई। इतनी दूर से कोई आया है, तो थोड़े धैर्य के साथ थोड़ी बात कर लें, जाने क्यों इसकी जरूरत नहीं महसूस होती उन्हें?

 

वनवासी झुंझला कर बोला— एक दाखिले के लिए तुमने दो साल खपा दिये और इस तीसरे का भी कोई पता नहीं क्या होगा, इससे अच्छा तुम मेरे साथ हो लेते तो चार पैसे अब तक बना लिए होते। इस फटेहाली में इतना हैरान… यार देख कर अच्छा नहीं लगता। सरकार ने पढ़ने के लिए इतनी योजनाएं चलाई है और जो पढ़ना चाहता है उसके साथ ये हो रहा है?

 

"हो तो यही रहा है, कम से कम मेरे साथ तो यही हो रहा है। और रही बात मेरी फटेहाली का तो… थोड़ा रुक गया, आंखें डबडबा आईं फिर बोला…  हिम्मत जुटा रहा हूं, जिस उम्र में परिवार का सहारा बनना चाहिए उस उम्र में मैं…."

 

वनवासी, बात के बीच में कहता है— भगवान मालिक! खैर, अब देखो, आखिरी दांव अभी बाकी है।"

 

"क्या करूं? पिछली दो बार भी बहुत सही इंटरव्यू गया था मेरा, पर.. जो भाग्य में न लिखा हो तो मिले कैसे?"

 

"और दो दिन तो है न इंटरव्यू के लिए, मैं तो कहता हूं इस बार मिल कर सीधे बात कहना ऐसे ज्यादा शिष्टाचार की ना जरूरत है, पर मिज़ाज पहले जान लेना उनका.. पढ़ने के लिए एक सीट ही तो मांग रहे हैं हम कौन सी उनकी नौकरी मांग रहे हैं।"

 

"हाँ, मैं भी यही सोच रहा था, ठीक है फिर कल दोपहर को ही मिल कर अपनी बात समझाने की कोई तरकीब सोचता हूं।"

 

खाना अब तक तैयार हो गया था। दोनों बन्धु खा पी कर सो रहे। दूसरे दिन संशय, तरद्दुद और आशा का एक मिला जुला भाव लेकर पहर दिन गुजरने के बाद विश्वविद्यालय के लिए अभिनव निकल पड़ा। वनवासी ने खिड़की से देखा कि अभिनव धीरे धीरे चलते जा रहा है मानों डगमगाती आशा को भरसक खड़ी करने की कोशिश करता हुआ जा रहा है। यहाँ वनवासी सोच रहा है सालों बाद आज फिर मंदिर जाएगा।

 

विश्वविद्यालय आ कर अपने विभाग पहुंच गया अभिनव।

 

प्रोफेसर उसकी पूरी बात सुनकर बोले— अच्छा, इंटरव्यू में आओ मैं देखता हूं।

 

ये सुनकर जैसे अभिनव के शरीर में पूरे संसार का बल समा गया। एडमिशन होने पर भी शायद उसे इतनी खुशी नहीं होगी जितनी अभी हो रही है। इससे पहले मैं कितना ग़लत था जो पूरी प्रोफेसर जात को ही बुरा समझता था कि ढ़ंग से बात नहीं बोलते। अभी कितने अच्छे से बात की उन्होंने। मुझसे वो बात नहीं भी करते तो कौन क्या कर लेता उनका, मेरा एडमिशन हो न हो उन्हें क्या गरज? पर सौ बात की एक बात, प्रोफेसर लोग होते बहुत अच्छे हैं। भगवान इनको और दें। ये सब सोचता हुआ वापस लौटा और वनवासी को सब कह सुनाया।

 

देर रात तक पन्ने उलटता और रह रह कर कमरे का चक्कर लगा आता। इंटरव्यू का सवेरा आ गया। अभिनव मंदिर में माथा टेक कर विभाग पहुंचा। शाम होने तक सबका इंटरव्यू तय हो गया। मन में एक अनुपम प्रसन्नता का भाव लेकर वापस लौट रहा है। कोई सवारी गाड़ी नहीं ली पैदल ही आ रहा था कि एका एक बिना मौसम बारिश से भीग गया। फिर भी कोई चिंता नहीं, बिल्कुल शांत, प्रसन्नता में कोई अंतर नहीं। बाकी सब तो बस बहाने हैं, असल खेल तो मन का है। जब मन अंदर से तृप्त हो तब बाहर की बारिश, सर्दी, घाम ये सब बेअसर।

 

आते से वकार का फोन आया। वकार विभाग के क्लर्क का बेटा है जो इतिहास विषय में परास्नातक में है। जिससे आज अभिनव लंच ब्रेक में मिला था, साथ खाना खाए, अच्छी पहचान हो गई थी। कभी कभी थोड़ी देर की मुलाकात से भी पक्की दोस्ती हो जाती है।

 

वकार— यार अभि, चयनित अभ्यर्थियों की सूची तैयार हो गई है और लगता है सोमवार को वेवसाईट पर डाल दी जाएगी।

 

अभिनव — क्या बात है, इतनी जल्दी! बहुत बढ़िया।

 

वकार— पर तुम्हारा नाम नहीं है, इसका रंज है।

 

मुद्रा झट से उसका गंभीर हो गया, बोला —अच्छा? मैं फोन करता हूं तुम्हें थोड़ी देर में।

 

यह सुनकर तो जैसे अभिनव की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। पल भर पहले खुशी से वह फूले न समाता था उस खुशी को एकदम जैसे ग्रहण लग गया। अंधेरा अंधेरा सा लगा उसे। ऐसा लगा कि कोई नहीं है उसका यहाँ परदेश में, सब बेकार है, सबकुछ उसे झूठ क्षणिक और असार लगने लगा। शक्ति जैसे किसीने उसकी सोख ली। रुआँसा हो आया, मुँह खोल कर दो चार बार लम्बी लम्बी सांसे ली और आंखें टिमटिमा कर आंसू रोकने की कोशिश की और खुद को सम्भाला।

 

आज शुक्रवार लग गया। डेढ़ घंटे बाद इंटरव्यू है। प्रोफेसर गवाक्ष को फोन आया।

 

चंद्र प्रकाश ने लापरवाही से कहा; "प्रोफेसर साहब…, तबीयत पानी कैसी है?"

 

चंद्र प्रकाश रूलिंग पार्टी के सांसद हैं। लोगों के लिए बड़े बड़े काम किए हैं। भले ही कुछ न किए हों पर इन लोगों के सम्मान में ऐसी बातें कहनी पड़ती हैं, चार बातें जोड़ जाड़ कर तारीफ का पुल बांधना ही अदब है।

 

"बस ठीक है सर। आपने मुझे कैसे याद किया? कोई प्रोग्राम है क्या यूनिवर्सिटी में?"

 

"अरे कोई प्रोग्राम नहीं, दो लड़कियों का एडमिशन करा दो, उनका डीटेल्स आप तक पहुंच जाएगा।"

 

"सर, दरअसल.."

 

बात सुने बगैर चंद्र प्रकाश ने कहा; "ठीक है, कर देना।"

 

इतना सुन कर जैसे तन बदन में आग लग गई प्रोफेसर की। पत्नी कमरे में कोट लेकर आईं। उन्हीं से कह पड़े — तंत्र की कठपुतली हैं हम? मेहनत, काबिलियत तो जैसे महज़ लफ्ज़ भर रह गए हैं, जिनका हकीकत में कोई मुकाम नहीं। कमबख्त अपाहिज बना दिए गए हैं हम लोग।

 

पत्नी बोलीं — आप टिचर हैं, समझते हैं। अगर कोई योग्य है और मुफ़लिस है तो उसे पहले मौका मिलता है तो अच्छा लगता है। और ऐसे लोगों की आह की चोट बेअसर नहीं जाती। सब लोग द्वंद्व की स्थिति का सामना करते हैं। थोड़ा समय लीजिए, अच्छा सोच पाएंगे।

 

प्रोफेसर पत्नी के इतना कह कर चले जाने के बाद खुले दरवाजे के उस पार देखते रह गए।

 

अभिनव ने निश्चय किया कि एक आखिरी बार बात करूंगा प्रोफेसर साहब से।

 

सोमवार दस बजे रहे हैं। नतीजा निकालना है, प्रोफेसर आज जल्दी आ गए हैं। अभिनव एक पल के लिए आसमान को देखता है फिर प्रोफेसर के केबिन के भीतर जाता है।

 

अभिनव— नमस्कार सर। सर मुझे पता चल गया है कि …इतना कह कर प्रोफेसर की विचारशील मुद्रा को चिंतित मुद्रा में बदलते देख चुप हो गया। कुछेक पल रुक कर फिर बोलता है.. आत्मा के उपर बोझ लेकर कहीं भी जाते हैं तब चित्त शांत न रहता। आगे आपका अख्तियार है।

अभिनव के चले जाने के पश्चात गवाक्ष थोड़ी देर गले की टाई खोली और कुछ देर चुप रहने के बाद इग्जाम बोर्ड पर कागज़ टिका कर कुछ लिखने लगे।

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