अनुपमा लेखक- रघुनन्दन महापात्र "उठ जा बेटा, जा जाके ब्रश कर ले।" इतना सुन कर बुद्धि उसकी जाग गई। बच्चा चार बरस का होगा। बिस्तर पर लेटे योजना कर रहा था कि कैसे आज ज़िद अपनी पूरी कराए। तुरंत बोला— "मम्मा, मैं अगर उठ जाऊंगा और ब्रश कर लूंगा तो मुझे बाज़ार ले चलेंगी न अपने साथ?" "अच्छा ले चलूंगी। मैं जब तक दादाजी का कमरा तैयार कर देती हूं, जाओ जाकर ब्रश कर लो।" जब अर्जुन के दादाजी गुसलखाने गए तब अनुपमा ने आकर पूरा कमरा साफ़ कर दिया, पैर की चटाई बदल दी, बिस्तर का चादर बदल दी, परदों को टटोला वो सही थे उन्हें रहने दिया। ये काम निपटा कर बावर्चीखाने चली। जाने कौनसा नियम चार साल के बच्चे ने ऐसे तोड़ दिया कि माँ बाप को बुलावा भेजते हैं स्कूल वाले। हम तो इस उम्र में सिवाय खेलने कूदने के और कुछ न करते थे और न जानते ही थे पढ़ाई क्या होती है। हाँ कभी कभी भैया स्कूल ले जाने का कह कर डराया करते थे। खैर, जल्दी जल्दी आज घर का काम समेट कर स्कूल चलना है। यही सब बातें ज़हन ...