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  भीमाभूयाँ उपन्यास में चित्रित आदिवासी जीवन लेखक- रघुनंदन महापात्र     विविधता में एकता हमारे देश की विशेषता है। विविधता में एकता से तात्पर्य है कि एक ही समाज में हम तरह तरह के विश्वासों के लोग रहते हैं ,  तरह तरह के धर्म को मानने वाले ,  भिन्न-भिन्न संप्रदायों से संबंधित लोग ,  अलग-अलग विचारधाराओं के लोग ,  कई कई नस्लों के लोग एक दूसरे की भावनाओं और भरोसे को बिना आहत किए एक साथ भाईचारे को बरकरार रखते हुए रहते हैं। ये विशेषता हमें अभूतपूर्व ताकत देती है। ऐसे उदाहरण हैं इतिहास में जब हम सब एक हो कर अपनी शक्ति सामर्थ्य का प्रदर्शन किए हैं ,  अपनी एकता से विश्व को अभिभूत किए हैं। लेकिन साथ में ऐसे भी दुर्भाग्यपूर्ण इतिहास से गुजरे हैं जब हम अपनी ओछी विचारों के चलते ,  भेदभावपूर्ण व्यवहार के कारण बंटे हुए नजर आते हैं। फलतः इसका परिणाम हमें बहुत भयंकर भूगतना पड़ा है। ऐसे कई समुदाय हैं जिनमें से एक आदिवासी समुदाय है जिससे हम इतिहास में कदम से कदम मिलाकर ,  कंधे से कंधा मिलाकर ,  साथ साथ एक साथ कभी कभी जरूर चले थे लेकिन हमेशा ऐसा नहीं हुआ...
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  बालपन लेखक- रघुनन्दन महापात्र छज्जे पर रंगों के डिब्बे डिब्बों पर ये नज़र आंखों से उसे टटोलते हुए, सबसे छोटे को ढूँढते हुए आंखों में उन छोटी छोटी सब्जी की क्यारियाँ नज़र घूमाने दूर लम्बे रास्ते पर कितनी ही कहानियाँ रचता उपक्रम बनता फिर बिगड़ता कभी कैरियाँ तोड़ने कभी क्यारियों में पानी डालने कभी बकरियों को पानी पिलाने किसी बहाने दहलीज़ से आगे दादी से छिपकर देख ही लेता मुंडी निकालकर रास्ता फिर खाली दिखता फिर बड़ी बड़ी आंखें सिकुड़ जातीं   मुन्ना! बेटा बकरियाँ गिन कर बताना सुनते ही दौड़ कर दादी तक पहुंच जाता उसी फुर्ती से वापस बकरी गिन कर दादी को बताता डिब्बों में से सबसे छोटा उठाकर पानी भर बाड़ी में डालता   ये कोमल तलवे ये तपते फ़र्श कोई तकरार नहीं दोनों शांत निश्चल दोपहर की गर्मी लू की वो हवा बच्चे के हौसले के आगे दम तोड़ती धूप ढ़लती   आंखें दौड़ती हैं दूर पलाश तक कोई नहीं सब खाली सब खाली हर बार मुट्ठी खोल कर देखता एक बार हथेली को एक बार फिर सुनसान रास्ते को   कुच नहीं कुच बी नहीं...
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  अनुपमा लेखक- रघुनन्दन महापात्र   "उठ जा बेटा, जा जाके ब्रश कर ले।"   इतना सुन कर बुद्धि उसकी जाग गई। बच्चा चार बरस का होगा। बिस्तर पर लेटे योजना कर रहा था कि कैसे आज ज़िद अपनी पूरी कराए। तुरंत बोला—   "मम्मा, मैं अगर उठ जाऊंगा और ब्रश कर लूंगा तो मुझे बाज़ार ले चलेंगी न अपने साथ?"   "अच्छा ले चलूंगी। मैं जब तक दादाजी का कमरा तैयार कर देती हूं, जाओ जाकर ब्रश कर लो।"         जब अर्जुन के दादाजी गुसलखाने गए तब अनुपमा ने आकर पूरा कमरा साफ़ कर दिया, पैर की चटाई बदल दी, बिस्तर का चादर बदल दी, परदों को टटोला वो सही थे उन्हें रहने दिया। ये काम निपटा कर बावर्चीखाने चली।         जाने कौनसा नियम चार साल के बच्चे ने ऐसे तोड़ दिया कि माँ बाप को बुलावा भेजते हैं स्कूल वाले। हम तो इस उम्र में सिवाय खेलने कूदने के और कुछ न करते थे और न जानते ही थे पढ़ाई क्या होती है। हाँ कभी कभी भैया स्कूल ले जाने का कह कर डराया करते थे। खैर, जल्दी जल्दी आज घर का काम समेट कर स्कूल चलना है। यही सब बातें ज़हन ...