भीमाभूयाँ उपन्यास में चित्रित आदिवासी जीवन
लेखक- रघुनंदन महापात्र
विविधता में एकता हमारे देश की विशेषता है। विविधता में एकता से तात्पर्य है कि एक ही समाज में हम तरह तरह के विश्वासों के लोग रहते हैं, तरह तरह के धर्म को मानने वाले, भिन्न-भिन्न संप्रदायों से संबंधित लोग, अलग-अलग विचारधाराओं के लोग, कई कई नस्लों के लोग एक दूसरे की भावनाओं और भरोसे को बिना आहत किए एक साथ भाईचारे को बरकरार रखते हुए रहते हैं। ये विशेषता हमें अभूतपूर्व ताकत देती है। ऐसे उदाहरण हैं इतिहास में जब हम सब एक हो कर अपनी शक्ति सामर्थ्य का प्रदर्शन किए हैं, अपनी एकता से विश्व को अभिभूत किए हैं। लेकिन साथ में ऐसे भी दुर्भाग्यपूर्ण इतिहास से गुजरे हैं जब हम अपनी ओछी विचारों के चलते, भेदभावपूर्ण व्यवहार के कारण बंटे हुए नजर आते हैं। फलतः इसका परिणाम हमें बहुत भयंकर भूगतना पड़ा है।
ऐसे कई समुदाय हैं जिनमें से एक आदिवासी समुदाय है जिससे हम इतिहास में कदम से कदम मिलाकर, कंधे से कंधा मिलाकर, साथ साथ एक साथ कभी कभी जरूर चले थे लेकिन हमेशा ऐसा नहीं हुआ है और उन्हें कहीं न कहीं सामान्य सामाजिक समुदाय से कम आंकते थे, उनसे उपेक्षा का भाव रखते थे। इन्हीं कारणों से तो आज आदिवासियों के बारे में हमें अलग से चर्चा करना पड़ रहा है। उनके प्रचलित अभ्यासों में, विचारों में, संस्कृति में, परंपरा में कुछ ऐसे उच्च कोटि के लक्षण हैं जिनको इसी उपेक्षा के भाव के वजह से हमने बदकिस्मती से नजरंदाज कर दिया था। आज ये हमारी सद्बुद्धि है और बेशक खुशकिस्मती है कि इतिहास के घटनाओं के जो इन (उपन्यासों, कहानियों) रूपों में लेखा जोखा है, उससे कुछ सिखने जानने के लिए आशायी हैं।
आदिवासी जीवन को लेकर ओड़िआ साहित्य में 'भिमाभूयाँ' सर्वप्रथम उपन्यास है जो सन् 1908 ई. में प्रकाशित हुआ था। इसमें रचनाकार श्री गोपालबल्लभ दास ने आदिवासियों के अच्छे बुरे गुणों जैसे बड़ों का सम्मान करना, प्रेम करना, त्याग करना, राज भक्ति, वीरता और विचारहीनता आदि का यथार्थ चित्रण किया है। उनकी परंपरा संस्कृति पर आलोकपात किया है साथ में एक रूढ़ सामाजिक व्यवस्था पर पुनर्विचार करने की ओर इशारा करते हैं। अनार्यों तथा आर्यों की सभ्यता और संस्कृति ओडिशा में तरह तरह से विभिन्न क्षेत्रों में मिलकर ओड़िआ जीवन को समृद्ध करता आया है। इसी मिश्र धर्म और संस्कृति को लेकर ओड़िशा का धर्म परंपरा और संस्कृति तैयार हुआ है। इसे जगन्नाथ धर्म और संस्कृति के नाम से जाना जाता है।' इसका आदिवासियों के संस्कृति पर स्वाभाविक असर है।
कुछ आदिवासी जातियां जैसे कंध, कोल्ह, भूयाँ, सांताल ओड़िशा के उत्तर भाग में देखने मिलते हैं और कुछ आदिवासी जातियां जैसे गदवा, परजा, कोया, गण्ड आदि ओड़िशा के दक्षिण भाग में देखने मिलते हैं। बालेश्वर जिला के मंगलपुर, साहावंदर और कामकुंड़ा के भूयाँ जाति के आदिवासी लोग शिक्षित सभ्य हो कर पैसे कमाकर उच्च जाति के समाज में जा मिले हैं। वे भूयाँ हो कर भी उन्हें कोई आदिवासी जैसा नहीं देखता, लेकिन कहीं कहीं भूयाँ जाति के लोग अपनी अच्छी जमीन और घर से खदेड़े जा कर घने जंगलों में रहने लगे। केन्दुझर जिला के भूयाँ इन्हीं में से हैं। इनका केन्दुझर के राजा से अच्छा संपर्क था। युवराज को जब सिंहासन पर बिठाया जाता है, तब अपने भावी राजा को ये भूयाँ अपने कंधे पर बिठाकर लाते हैं, ऐसी परंपरा जमाने से चली आ रही थी। भूयाँ के युवराज को उठाकर लाकर बिठाने के बाद युवराज का राज्याभिषेक किया जाता है। उसके बाद राजा उन भूयाँओं के सर पर पुरस्कार स्वरूप साड़ी बांधते हैं। राजा भूयाँओं के सरदार का निर्वाचन कराते हैं। भूयाँ अपने राजा को भगवान जैसा मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं। बड़े राजभक्त होते हैं।
युवक युवतियों के 'चांगुनृत्य', 'ड़ालभंगानृत्य' भूयाँओं के अति प्रिय उत्सव हैं। भूयाँओं के 'माघपोड़' त्योहार से इस उपन्यास का आरंभ होता है। तीन दिन के मौज मस्ती के बाद चौथे दिन कई गांवों के आमंत्रित अनामंत्रित युवक युवती बुजुर्ग सब पधारते हैं। भूयाँ सरदार का द्वार शत्रु मित्र परिचित अपरिचित सभी के लिए खुला रहता है। आमंत्रित हो या न हो सभी का समादर से स्वागत और आतिथ्य अवश्य की जाती है। किसी के साथ भी कोई भी गलत बर्ताव नहीं किया जाता, चाहे छोटे हों बड़े हों, जात के हों या बिनजात के हों सब एक जैसे होते हैं। इससे भूयाँओं के भाईचारे का पता चलता है। उपन्यासकार के शब्दों में, 'ऐसे परम पवित्र आनंद के तरंग में कम-खर्ची स्वभाव छूट जाता है। बंदी कारागार से मुक्त होता है और शत्रु भाव नहीं रहता।" एक एक गुट आकर चांगुनृत्य, चांगुगीत, चांगुबाजा नाचते गाते बजाते हैं और फिर दूसरे गुट को मौका देते हैं। इस प्रकार इनका ये उत्सव चलता है। फिर सब भोजन करते हैं, पीने की भी खूब व्यवस्था रहती है। जैसे अग्नि सब ग्रहण कर के किसी का गुण दोष नहीं बताती, वैसे ही भोजन कर के सभी में संतोष आनंद की लहर चलती है। जिसके लिए जो चहेता है वो उसे खुश कराने में लगा हुआ रहता है। कोई सुखी होने में तो कोई सुखी कराने में, कोई मस्ती करने में तो कोई मस्ती देखने में सुख पाता है। युवक युवतियाँ प्यार करने में मजे करने में खुश होते हैं तो बुजुर्ग उसे देखकर खुश होते हैं। कोई किसी के सुख में बाधा नहीं डालता। कोई किसी का विरोध नहीं करता। युवक युवतियाँ अलग अलग गुट में अलग अलग गांव जाकर चांगुनृत्य करते हैं और वहाँ अपने अपने जीवनसाथी चुनते हैं। इसका मतलब यह निरा स्वेच्छाचारिता नहीं है माता पिता ही अंतिम निर्णय करते हैं। इस प्रक्रिया में कहीं किसी पर जबरदस्ती होने की संभावना बहुत कम होती है। सबसे अच्छी बात यह होती है कि लड़की को अपने पति चुनने के लिए छुट होती है तथा विकल्प भी अधिक होते हैं जो की आज भी हमारे समाज में इस चीज की कमी है। आज भी ऐसे बहुत जगह हैं जहाँ लड़की को इतनी स्वच्छंदता नहीं मिलती। इनके इस परंपरा में आधुनिकता स्पष्ट देखी जा सकती है। भूयाँओं के समाजिक व्यवस्था में स्त्री को पुरुष से कम अवसर नहीं मिलता अपने वर चुनने में। बड़े बुजुर्गों के सामने प्रेमक्रीड़ा, शादी के लिए चांगुनृत्य से प्रेमी और प्रेमिका का वन गमन इनके लिए शंका, भय, निंदा, घृणा का विषय नहीं है। अपने अपने मन का जीवनसाथी चुनना चांगुनृत्य का मुख्य उद्देश्य है। भूयाँ किसी पाठशाला में नहीं जाते उनके बुजुर्ग उन्हें शिक्षा देते हैं, उनके बुजुर्ग ही उनके लिए शिक्षक हैं गुरु हैं। भूयाँ युवक युवती बहुत सारी चीजें देखते हैं सिखते हैं पर अपने बड़ों का अवहेलना नहीं करते, न उनके ज्ञान को तुच्छ समझते हैं, उनका यथोचित सम्मान करते हैं, उन्हें मानते हैं। बड़े बुजुर्ग युवक युवती को समझते हैं, उनका सुख का ध्यान रखते हैं, उसी में अपना सुख समझते हैं। आधुनिक सोच का एक और प्रमाण है यह।
उपन्यास का मुख्य पात्र 'भीमा' जो आदिवासियों के भूयाँ जाति का एक युवक होता है। वो और उसका बड़ा भाई एक ही लड़की से प्रेम करते हैं। लड़की के मन में दोनों के प्रति प्रेम भाव होता है। ऐसे में लड़की के पिता और भीमा के पिता ने लड़की की शादी भीमा के बड़े भाई से करा देते हैं। मन में दुःख होते हुए भी भीमा बिना आपत्ति के पिता के निर्णय को स्वीकार करता है और अपने पितृभक्ति का प्रमाण देता है। एक दिन उनके और उनके पड़ोसी राज्य के मध्य युद्ध छिड़ जाता है, तब भीमा अपने पड़ोसी राज्य के राजा के सैन्यदल में होता है। अपने विरता का प्रदर्शन करते हुए वो एक अहम प्यादे को बंदी बना लेता है और इसके कारण युद्ध जीत जाते हैं। युद्धोपरांत भीमा को पुरस्कार प्रदान किया जाता है और भीमा को कुछ युद्ध बंदियों का सर कलम करने का राजा आदेश देते हैं। जब भीमा को पता चलता है कि उन युद्धबंदियों में उसके पिता और भाई भी शामिल हैं जिनका सर कलम करने का उस पर आदेश है तो वो अपने पिता और भाई के साथ बहुत रोता है। एक तरफ राजाज्ञा तो दूसरी तरफ बाप भाई, इस द्वंद्व में वो अपने बाप भाई को नहीं मारता, कहीं छिपा देता है। भीमा को उसके बाप और भाई सुझाव देते हैं कि उन्हें मारने के बजाए किसी और दो लोगों को मारकर उनके सिरों को पेश कर दे तो वो बच जाएंगे। इस पर भीमा जवाब देता है- भीमा के शब्दों में, 'तो और दो मस्तकों की बात कह रहे हो। मैं जा कर देखता हूं। तुम यहीं छुपे रहो।' इसमें आदिवासी भीमा का परिवार मोह में अंधा हो कर औरों को मार देना निश्चय ही उसके व्यक्तित्व का घृणित पहलू है।
राजा बीमार पड़ जाते हैं कोई वैद्य उन्हें ठीक नहीं कर पाता है और इस खबर से परेशान हो कर भीमा अपने राजा से मिलता है और अपने परिचित एक वैद्य को बुलवा कर राजा की बीमारी का इलाज कराने की आज्ञा ले कर वापस लौटता है। अपने पिता को वैद्य के रूप में वह राजा के पास ले कर आता है। और राजा के आज्ञानुसार उसके पिता इलाज करते हैं और भीमा वहीं बैठा रहता है। तब राजकुमारी अपने पिता को देखने के लिए बार बार वहाँ आती रहती है। भीमा और राजकुमारी की नजरें एक दूसरे से मिलती हैं और दोनों एक दूसरे से प्रेम करने लग जाते हैं। जैसे जैसे राजा का स्वास्थ्य ठीक होता जा रहा था उनका प्रेम परवान चढ़ रहा था। अगली सुबह राजा स्वस्थ हो जाते हैं और वैद्य (भीमा के पिता) पर प्रसन्न होते हैं। भीमा के कारण ही राजा का इलाज संभव हो पाता है। इस घटना में भीमा की अमूल्य राजभक्ति साफ दिखता है। जल्द ही भीमा का अपने पिता और भाई को बचाकर राजा की अवज्ञा करने की बात खुल जाती है। इसपर भीमा अपना अपराध स्वीकार करता है मरने के लिए प्रस्तुत हो जाता है और अपने पिता और भाई को मृत्यु दण्ड न दिया जाए ऐसा गुहार लगाता है। अपने परिजनों को बचाने के लिए वो अपने प्राणों की बलीदान देने के लिए तैयार हो जाता है। यहाँ उसके निस्वार्थ और त्याग भाव निश्चय ही प्रशंसा के योग्य है।
राजा की अवज्ञा के अपराध में राजा भीमा को मृत्यु दण्ड देने का आदेश देते हैं। तब राजकुमारी राजा से अनुरोध करती हैं और भीमा की जान बचा लेती हैं। इस घटना के पश्चात भीमा को महल में बुलाया जाता है और भीमा से राजकुमारी उसके युद्ध में वीरता प्रदर्शन से मिला पुरस्कार मांग लेती हैं और अपना मांगटीका भीमा को देकर कहती हैं कि जब वो अपने इंद्रियों को वश में करके निर्विकार निर्मल प्रेममय पुरुष बनकर मांगटीका लेकर उनके पास आएगा तब उसे उसके पहले वाले पुरस्कार को परिवर्धित कर के जितेंद्रिय पद के पुरस्कार से विभूषित किया जाएगा। बहुत दिनों बाद भीमा और राजकुमारी का तय शर्त पर मुलाकात होती है। तब तक दोनों संपूर्ण प्रेममय बन चुके होते हैं। उनका प्रेम शारीरिक न हो कर आत्मिक नजर आता है। उनके प्रेम का अंत त्याग में हुआ है।
उस समय ये उपन्यास देश में रीति काव्य का सुलभ प्रणय गाथा पढ़ने के आदी पाठकों के मन को अवश्य उद्वेलित कर दिया होगा। आदिवासी भीमा और राजकुमारी के प्रेम का वर्णन कर के एक परिवर्तन की और संकेत किया गया है, स्थापित सामाजिक रूढ़ व्यवस्था के उपर प्रहार किया गया है। आदिवासी भूयाँओं के कुछ सामाजिक प्रथाओं का यथार्थ चित्रण किया गया है। जगह जगह एक आदिवासी की उदात्त भावनाओं का परिचय मिलता चला जाता है जो हमेशा अनुकरणीय रहेंगे। इसके साथ उसके व्यक्तित्व का दुर्बल पक्ष का भी चित्रण हुआ है। 'भीमाभूयाँ' उपन्यास से आदिवासी जीवन के कई पहलू प्रतिबिंबित होते हैं।
संदर्भ-सूची :-
1. मुखबंध, भीमाभूयाँ, गोपालबल्लभ दास, संपादिका श्रीमती सरला देवी, प्रकाशक विद्यापुरी, नवीन संस्करण 1964, पृ -घ
2. वही, पृ.-घ
3. वही, पृ.-ङ
4. भीमाभूयाँ, पृ 04
5. वही, पृ 74
6. Odia Upanyasa Sahityara Parichaya, Published by& Sri Govind Charan Patra, ODISHA BOOK STORE, Second Edition 1999, Page no 64-65.

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