समकालीन हिन्दी कविता और भारतीय कृषक जीवन लेखक-रघुनन्दन महापात्र मनुष्य सभ्यता के विकास में कृषि की अनिवार्य भूमिका रही है। हमारे देश के ग्रामिण क्षेत्रों में अधिकतर घर कृषि से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़े हुए हैं तथा आजकल शहरों में भी ऐसे लोगों की तादाद बहुत कम नहीं है। हिन्दी साहित्य पर जब से मार्क्सवाद का प्रभाव पड़ने लगा तब से साहित्य के केन्द्र में व्यक्ति का महत्व बढ़ने लगा। और यहाँ व्यक्ति से तात्पर्य है आमजन। आमजन में कामगार और किसान भी आते हैं। इस तरह से समकालीन हिन्दी कविता में किसान जीवन के विविध पहलुओं का चित्रण मिलता है। बीसवीं सदी के आठवें नौवें दशक से लेकर अबतक की हिन्दी कविताओं को हम समकालीन कविता कहते हैं। समकालीन कविता के दायरे में ऐसे वो तमाम सामाजिक, राजनैतिक तथा आर्थिक मुद्दे आते हैं जो इन्सान के जीवन के विभिन्न पक्षों की सच्चाई को अनावृत करते हैं। भारतीय समाज मुख्यतः कृषि-भित्तिक है। यहाँ अधिकतर जनसंख्या कृषि पर आश्रित है। यहाँ की सामाजिक चेतना, संस्कार, संस्कृति, परंपराएँ मूलतः खेती से...