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मालिनी लेखक- रघुनन्दन महापात्र धर्मदास अपनी दोनों औलादों पर जान छिड़कते हैं। आराधना भी पिता से मोह रखती है। यहाँ तक कि वह पिता को छोड़कर जाना पड़ेगा, इसी खयाल से शादी के लिए राजी नहीं होती थी, मगर आखिरकार चार बातें सोच कर शादी कर लेती है। छोटी, मालिनी ग्यारहवीं में है। पढ़ाई में होशियार है और दुनियादारी भी कुछ कुछ समझती है। माता पिता की कुर्बानियों की अहमियत को वह समझती है और प्रतिदान में उसे क्या क्या करना है उसकी एक लम्बी फ़हरिस्त है जिसे याद करके अपने मुरझाए हुए जोश को ताज़ा कर लेती है।   ललिता, धर्मदास की पत्नी, कक्षा दूसरी तक पढ़ी हैं लेकिन उनको भागवत कथा पढ़ना आता है और रोज़ संध्या बेला में पड़ोस के 10-12 औरतें बुढ़े कथा सुनने उनके घर के प्रांगण में बैठते हैं। मालिनी भी सप्ताह में दो एक दिन श्रोताओं में बैठ जाती है।   धर्मदास के स्कूल के दिनों का सहपाठी गोलक बिहारी, जो एक परचून की दुकान चलाता है। दुकान उसकी कस्बे के बीचों-बीच है, आमदनी ऐसी कि दो और परिवार चला सकता है। जब धर्मदास को अपनी दुकान के सामने से गुज़रते देखता है तो बेफ़िक्री अंदाज में आवाज़ लगा देता है —   ...