समकालीन कविता और कवि वेणुगोपाल की काव्यदृष्टि

लेखक- रघुनन्दन महापात्र


 

कथ्य की दृष्टि से जीवन की विविधतापूर्ण दैनन्दिन परिस्थितियों के प्रति सजग व्यक्ति की भाषाई संवेदनात्मक प्रतिक्रिया समकालीन कविता का एक ज़रूरी शर्त है। समकालीन कविता किसी खास विचारधारा से संपृक्त नहीं है बल्कि संश्लेषित भावों तथा विविध प्रवृत्तियों का एक समुच्चय है जो इस कविता को खड़ी करती है। समकालीन कविता यथार्थ के धरातल पर सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में आत्मचेतस व्यक्ति की भाषागत संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है, जो जीवन-संघर्ष में विभिन्न रागात्मक बोधों व मानव मूल्यों, मानवाधिकार के सृजनात्मक पक्ष की पहल ही नहीं करती है, बल्कि प्रतिबद्ध रूप से सामाजिक विकास के वर्गहीन सौन्दर्यात्मक संसार की पक्षधर भी है।” (1)

अब तक की लगभग सभी हिन्दी काव्यधारा के विपरीत किसी विशेष भावधारा से या किसी खास आन्दोलन से समकालीन कविता शुरू नहीं हुई है। लगातार घटनाएँ इसको एक खास तरह की बनाने के लिए अपना योगदान देती आईं हैं। और ये घटनाएँ अलग-अलग समय में घटती हैं इसलिए समकालीन कविता की शुरूआत को लेकर एक द्वन्द्व की स्थिति बनी रहती है। कोई आलोचक कुछ कहते हैं तो कोई कुछ। प्रतिष्ठित कवि-आलोचक राजेश जोशी कहते हैं- 85 में बिलगेट्स के विण्डो का आना..... सी. एन. एन. का प्रवेश, सूचना के अधिकार और मुद्रा के प्लास्टिक मुद्रा में रूपान्तरण के साथ ही सोवियत संघ में समाजवादी समाज के पराभव ने इस समय के बीच एक विभाजक रेखा खींच दी। शीतयुद्ध की समाप्ती की घोषणा अमेरिका ने जिस आक्रामक तेवर और उद्दण्डता के साथ की... मुझे लगता है कि समकालीन पद को इस्तेमाल करने के लिए हम इन विभाजक रेखाओं को स्वीकार किए बिना आगे नहीं बढ़ सकते।”(2) और इससे पहले वह लिखते हैं- मैं सोचता हूँ कि एक महाजाति के जीवन में घटित हुई एक ऐसी घटना जो सामूहिक मन मस्तिष्क को विचलित कर डालती है, जो समय को अवधारणात्मक या मानसिक स्तर पर उस घटना से पहले और बाद में की स्थितियों में बाँट देती है, उसे समकालीनता को निर्धारित करनेवाली एक सीमा-रेखा मान लिया जाना चाहिए।”(3) तो राजेश जोशी के अनुसार सन् 85 के आसपास के समय को समकालीन कविता का आरम्भ का समय मानना चाहिए। लेकिन वहीं प्रख्यात आलोचक रोहिताश्व लिखते हैं कि- वस्तुतः स्वतन्त्रता प्राप्ति के पश्चात राजनैतिक क्षेत्र में कॉन्ग्रेस दल द्वारा प्रजातन्त्रीय आपाधापी का खेल, भारत के शहीद और सच्चे क्रान्तिकारियों के प्रति सत्ता का उपेक्षा का भाव, दक्षिण भारत में निजाम राज्य की समाप्ति हेतु आर्य समाजी आन्दोलन, तेलंगाना की सशस्त्र क्रान्ति, राष्ट्र मण्डल की  सदस्यता मिश्रित उद्योगनीति, अहिंसा और पंचशील के लचर सिद्धान्त, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के संविधान पर आधारित भारतीय व गणतन्त्र का सम्विधान... इन सबके बावजूद एक ही प्रवृत्ति के लोगों का अनेक दशाब्दियों तक पार्टि बदल कर सत्ता में रह जाना और अन्ततः 1962 में भारत-चीन सीमा संघर्ष तथा उसमें भारत की शर्मनाक पराजय, मोहभंग, विसंगतिबोध, नेहरू युग की समाप्ति (1964) समकालीन कविता के प्रस्थान बिन्दु के महत्वपूर्ण तत्व तो हैं ही...”(4) तो रोहिताश्व के अनुसार समकालीन कविता का आरम्भ 60 के दशक से ही हो गया था। समकालीन हिन्दी कविता के आरम्भ को लेकर राजेश जोशी और रोहिताश्व दो अलग-अलग समय काल की ओर इशारा करते हैं। इस द्वन्द्व की स्थिति को सुलझाने के लिए हम विश्वंभरनाथ उपाध्याय के इस कथन का आश्रय ले सकते हैं। समकालीन हिन्दी कविता पर विश्वंभरनाथ उपाध्याय ने कहा है, आज की कविता (समकालीन कविता) में काल अपने गत्यात्मक रूप में ठहरे हुए हैं। ...... क्षण याक्षणाँश के रूप में भी नहीं, काल-प्रवाह की आघात और विस्फोट की कविता है। (5)

उपर्युक्त इन तीनों कथनों पर गौर करें तो लगता है कि किस निर्दिष्ट बिन्दु से समकालीन कविता का सूत्रपात हुआ उसपे बहस को और आगे न खिंचते हुए हमको ये समझना चाहिए कि उस संदिग्ध बिन्दु का निर्धारण करने का हठ कदाचित व्यर्थ है। समकालीन हिन्दी कविता किसी एक भेदक रेखा से शुरू नहीं होती बल्कि कुछ महत्वपूर्ण घटनाएँ जो तीन-चार दशकों में धटित हुई हैं, वो तमाम घटनाएँ समकालीन कविता के धीरे-धीरे उभार और लगातार खुद को परिवर्तित करते रहने में अहम भूमिका निभाती हैं। ये घटनाएँ 60 के दशक से शुरू हो जाती हैं जेसे- कई राज्यों में कॉन्ग्रेस की हार, भारत-चीन सीमा संघर्ष में भारत की शिकस्त, दो-दो प्रधानमन्त्रियों की मृत्यु, नक्सलवाड़ी आन्दोलन और उसका फैलना, संपूर्ण क्रान्ति, आपातकाल की स्थिति, पहली गैर-कॉन्ग्रेसी सरकार का गठन, फिर कॉन्ग्रेसी सरकार का सत्ता में वापसी, सूखा, बाढ़, अकाल की स्थिति, इन सब से मोहभंग का वातावरण, विण्डो का आना, सोवियत संघ में समाजवादी समाज का पराभव आदि कई घटनाएँ जिम्मेदार हैं।

समकालीन हिन्दी कविता की धारा करीब 60 वर्षों से चल रही है, वो और बात है कि ये और काव्यान्दोलनों में से कितना अधिक या कम गौरवान्वित रही है। इस पर बहस हो सकती है पर निःसंशय ये धारा आधुनिक काल की सबसे लम्बी चलने वाली धारा है। जिसमें पुराने काव्यान्दोलनों के कवि भी शामिल हैं, नए भी उभरे हैं और लगातार युवा कवि और कवयित्री शामिल हो रही हैं। इनमें से आन्ध्र प्रदेश के कवि वेणुगोपाल अपना विशेष स्थान रखते हैं।

2023 तक वेणुगोपाल के कुल तीन कविता-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। पहला है वे हाथ होते हैं’ (1972), दुसराचट्टानों का जलगीत’ (1980) और आख़िरीहवाएँ चुप नहीं रहतीं’ (1980)। ताज्जुब की बात है कि उसके बाद दीर्घ 27 बरस तक उनका कोई कविता-संग्रह नहीं आया। सीधा 2007 जनवरी में तद्भव के 15वे अंक में उनकी चार कविताएँ आईं। हवाएँ चुप नहीं रहतीं की भूमिका में वेणुगोपाल ने लिखा है कि कविता मेरी आँख का अशरीरी विस्तार हो गई है। और अब मैं अपना साक्षी हूँ। और अपने समय का। जिसके खिलाफ मैं शुरू से ही रहा। और इसलिए मैं अपने से बाहर देखता रहा। यह आँख का अशरीरी विस्तार अपने को अपना साक्षी भी बनाता है और अपने समय का भी”(6) साठ के दशक में बंगाल और बिहार में सूखे का असर था। उद्योग के क्षेत्र में भी मन्दी का समय था। राजनीति में कॉन्ग्रेस के खिलाफ लोहिया के नारे का असर बढ़ा। इस परिदृश्य की कविता पर असर को ध्यान में रखते हुए राजेश जोशी कहते हैं- वेणुगोपाल की कविता में जयप्रकाश या लोहिया एक प्रॉक्सी लगाने वाले की तरह आते हैं।... अनुपस्थित और प्रॉक्सी लगाने का यह खेल अलग-अलग तरह से वेणु की कविता में कई स्तरों पर देखा जा सकता है। वेणु की कविता भी कई बार, खैर... पर खत्म होती है या उदास दोस्तों से उन अनुपस्थित खबरों को पढ़ने का आग्रह करती है जो भविष्य के पृष्ठों पर इतिहास का कलम लिख रही है।”(7) उनकी कविता उस समय के भाव को, उसकी आशा और निराशा को भी अभिव्यक्त करती है। उनकी एक बहुत छोटी कविता है और सुबह है जिसमें एक खास नज़रिए से सुबह को दैखा गया है। कविता इस प्रकार है-

हम सूरज के भरोसे मारे गए

और सूरज घड़ी के।

जो बंद इसलिए पड़ी है

कि हम चाबी लगाना भूल गए थे।

और सुबह है कि हो ही नहीं पा रही है। (8)

यहाँ कदाचित सूरज का आना मतलब मौजूदा त्रासद स्थिति से मुक्त होना है और हमारा चाबी भूलने से मतलब सही समय पर कोई ज़रूरी काम हमने नहीं किया है जिसका खामियाजा ये हुआ कि अभी अंधेरा छंट नहीं रहा और स्थिति सुधर नहीं रही। समकालीन परिदृश्य पर लिखी गई यह कविता अपना छाप अवश्य छोड़ती है। भरत प्रसाद वेणुगोपाल में कवि-दृष्टि के होने का तो स्वीकार करते हैं लेकिन उनके समर्थ कवि होने में संदेह प्रकट करते हैं। वे कहते हैं- इसे भले ही विलक्षण और बेशकीमती दृष्टि न कहा जा सके, परन्तु वेणुगोपाल के पास सार्थक कवि-दृष्टि मौजूद है।... उनकी कविताओं में उद्देश्यपूर्ण भाषा-भंगिमाएँ कुछ इस तरह लहरती हैं कि सहसा विश्वास नहीं होता, वेणुगोपाल समर्थ कवि बनने से चूक कैसे गए? जिसके पास पारदर्शी आँखें हैं, भावानुगामी भाषा है, सृजन की आकुलता को प्रकट करने का माद्दा है, वह कैसे और क्यों हार जाता है...” (9)

वेणुगोपाल की कविता के बारे में राजेश जोशी और कहते हैं- वेणु की कविता भारतीय जनता के स्वभाव में जो ठहराव है और एक किस्म की लापरवाही है। यथास्थिति है। उसकी कविता में इस ठहराव का ज़िक्र बार-बार आता है। कविता की कहन में वह इसे एक प्रविधि की तरह इस्तेमाल करता है।”(10) हिन्दी कविता की वाग्मिता के दौर में वेणुगोपाल की कविता में ये ठहराव पाया जाता है।

भारतीय राजनीति के उथल-पुथल के काल में अन्य समकालीन कवियों की तरह वेणुगोपाल की कविता भी राजनीतिक प्रभाव से अछुता नहीं है। रतनकुमार पाण्डेय लिखते हैं- वेणुगोपाल की कविताएँ भी वामपंथी समझ और मध्यवर्गीय रुचि पर बड़ी सतर्कता से टिकी हैं। अपनी कविताओं के द्वारा वे जनवादी संवेदना की आदिम संरचना को उभारते हैं।”(11) उनकी कविता का ध्यान तत्कालीन सामाजिक जीवन पर भी है। पाण्डेय जी आगे लिखते हैं- कवि वेणुगोपाल संस्कृति ह्रास, मूल्यों के खोखलेपन, जीवन की एकरसता एवं मध्यवर्गीय संस्कारों की मौकापरस्त नीति को भली-भाँति पहचानते हैं।”(12) कविता में राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक वस्तुस्थिति पर वेणुगोपाल का नज़र है और उसका असर भी। कवि में जगह जगह अन्तर्विरोध भी परिलक्षित होता है। लगातार नई नई घटनाएँ समकालीन दौर में घटती रही हैं और जब तमाम घटनाओं को निरपेक्ष भाव से समझने की कोशिश करते हैं तब एक भावुक कलाकार में अन्तर्विरोध दिख जाए यह न ही कोई आश्चर्य की बात है और न ही कोई खास कमजोरी। जगुड़ी की तरह वे (वेणुगोपाल) भी अन्तर्विरोध के शिकार होते हैं, जब एक ओर कहते हैं,जिन्दगी के दरवाजे कविताओं से नहीं खुलते,कविताएँ कार्यरता का दस्तावेज है और दूसरी ओर स्वयं लिखते हैं,माचिस है मरे हाथ में कलम के नाम पर/चाह है कि एक दावानल भड़काऊँ।’”(13)

 

निष्कर्ष—

साठ के दशक से लेकर अबतक के समय को हिन्दी साहित्य इतिहास में समकालीन दौर माना गया है। समकालीन कवियों की कविताओं में इस समकालीन दौर के यथार्थ की अभिव्यक्ति और प्रतिक्रिया मिलती है। समकालीन कवि वेणुगोपाल आठवें दशक के कवि रहे हैं। उनकी कविताओं में समकालीन परिदृश्य का दस्तावेज छिपा है। उनकी कविता उनकी आँख का विस्तार है। उनकी कविता में अतीत की पड़ताल से भविष्य की ओर इशारा है। उनकी कवि-दृष्टि को स्वीकारने के साथ उनके कवि-सामर्थ्य पर संदेह करने वाले आलोचकों के पास उनका अपना तर्क है। वेणुगोपाल की कविता जनता की सामुहिक लापरवाही और एक ठहराव को पहचानती है अतः उस वाग्मिता के दौर में भी उनकी कविता में वो ठहराव देखा जा सकता है। वामपंथी समझ से भरी उनकी कविता जनवादी संवेदना को उभारती है। उनकी कविता संस्कृति ह्रास, मूल्यों के खोखलेपन, जीवन की एकरसता एवं मध्यवर्गीय संस्कारों की मौकापरस्त नीति को भली-भाँति पहचानती है। मध्यवर्गीय मानसिकता के कवि वेणुगोपाल खुद इस वर्ग की सोच का खुलासा करते देखे जाते हैं। मध्यवर्गीय मानसिकता में जो सारी कमजोरियाँ हैं उनको अपनी कविता के ज़रिए सबके सामने लाने की कोशिश करते हैं। इस प्रकार कवि स्वयं को सर्वहारा के साथ जोड़ना चाहता है। अपनी सृजनात्मक साहित्य-यात्रा में कवि एक बेचैनी के साथ बदलाव की उम्मीद करता नज़र आता है। अपने इस काव्य-यात्रा में कवि अंतर्विरोध के भी शिकार होते हैं। मुसलसल चिन्तन करते रहना या खुद की समझ और विचारों को अन्तिम न मान कर उन्हें परखते रहना तथा संशोधित करते रहने से अक्सर ऐसे अन्तर्विरोध की गुंजाइश रहती है। इस तरह से ये अन्तर्विरोध उनकी एक विशेषता है। राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक सरोकारों से सम्पन्न कविताओं के शिल्पकार वेणुगोपाल अपनी कविताओं को समसामयीक यथार्थ की अभिव्यक्ति का माध्यम तो बनाते ही हैं साथ ही वह इस कविता को जनता का समर्थ स्वर भी बनाते हैं। अन्ततः यह कहा जा सकता है कि वेणुगोपाल तीन कविता संग्रहों के साथ एक सार्थक जवाबदेह समकालीन कवि हैं, इसमें संशय नहीं है।

         

संदर्भ-

1.       जदीद फिक्र : अदबी रूझानत (उर्दू), रोहिताश्व, पृष्ठ 97

2.       समकालीनता और साहित्य, राजेश जोशी, राजकमल प्रकाशन, दूसरा संस्करण 2015, पृष्ठ 36

3.       वही पृष्ठ 35

4.       समकालीनता और शाश्वतता, रोहिताश्व, विद्या प्रकाशन, कानपुर, प्रथम संस्करण 2006, पृष्ठ 61

5.       वही पृष्ठ 62 (द्वितीय स्रोत)

6.       एक कवि की नोटबुक, राजेश जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण 2004, पृष्ठ 197

7.       वही पृष्ठ 198-199

8.       वेणुगोपाल, साभार, समकालीन हिन्दी कविता, सं. ए. अरविन्दाक्षन, प्रथम संस्करण 1990, पृष्ठ 214

9.       कविता की समकालीन संस्कृति, भरत प्रसाद, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण 2017, पृष्ठ 138

10.  समकालीनता और साहित्य, राजेश जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2015, पृष्ठ 98-99

11.  साठोत्तरी कविता विद्रोही प्रतिमान, रतनकुमार पाण्डेय, अनंग प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण 2005, पृष्ठ 222

12.  वही पृष्ठ 222

13.  वही पृष्ठ 222

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