रूमानियत

लेखक- रघुनन्दन महापात्र

 


पौने आठ हो गया। और आधा घंटा बीते तो चलूं। अमूमन ऐसा होता है कि जब हम चाहते हैं कि समय जल्दी कटे कटता ही नहीं। इंतजार के पल धीरे गुजरते हैं। कम्बख्त यही आधा घंटा मुझको अभी आधा दिन की तरह लगने वाला है। पता था मुझको कि इतने में मेरे कपड़े भी धुल जाएंगे और कमरे में झाडू भी लगा लूंगा पर मन नहीं माना। मैं कोई गुंजाइश नहीं रखना चाहता था कि टाइम ज़रा भी लेट हो। तैयार तो मैं साढ़े सात बजे से हो गया था। काम में रत्ती भर का मन नहीं बावजूद उसके कुछ कुछ करने लगा, ऐसे मुर्दों की तरह हाथ पांव पत्थर कर के तो नहीं बैठ सकता था तो टेबील सजाने लगा, देखते देखते पूरा कमरा सज गया। सिर उठाया तो अभी भी दस मिनट बचे हैं। शीशे को पहले से इतना देख चुका था कि अब और देखना मतलब अपने में किसी कमी को जबरन ढूंढने जैसा है जो कि इस मामले में कतई कॉन्फिडेंस गिराता है। यका यक याद आया कि रूमाल में परफ्यूम तो लगाया ही नहीं, फिर वो लगाया,अब तक मैं पूरी तरह तैयार हो गया था और मन ही मन सोच रहा था कि जब दूल्हा बनूंगा तब भी शायद इससे कम वक्त लूंगा।


मन इतना उतावला हो रहा था कि अब चाहे बारिश भी हो जाती तो भी जाकर उसी बेंच में बैठता जहां उस गुलमोहर के झाड़ के पास मैंने उसको कल पहली बार देखा था। गनीमत है बारिश नहीं हुई। दरवाजा टिका कर चला। चाल कभी तेज़ होती कभी धीमी। देर हो गई तो वो वहां से गुजर जाएगी, आज का दिन बेकार जाएगा और जल्दी जल्दी चलूं तो पसीने आएंगे और कहीं अगर उसकी नजर मेरे ऊपर पड़ गई, जो कि मैंने मान लिया था कि आज जरूर मुझको देखेगी, तो पसीने की वजह से सारा इंप्रेशन खराब हो जाएगा। आफ्टर ऑल ये मेरा पहला इंप्रेशन होने वाला था।


बेंच की ओर बढ़ रहा हूं तभी घंटी बजी..

ला.ला..ला.ला..ला…..

"नमस्कार सर। मैं अरूंधति ज्वेलर्स से सिंधु बात कर रही हूं, धनतेरस आ रहा है और अभी हमारे यहां ऑफर चल रहा है, कुछ ले सकते हैं, मैकिंग चार्ज सिर्फ वॉन पर्सेंट है।" ..एक ही सांस में बोल गई।


मुझे इस बात से कोई रुचि नहीं थी और माली हालत तो ऐसी कि खाली मैकिंग चार्ज ले कर सोने का दाम छूट कर दें तो भी शायद मैं नहीं ले पाता। तो मैं बिना कुछ बात किए फोन काट सकता था, पर अब तक मैं गया था चिढ़, तो नॉर्मल भी होना था, तो मैं….


 "अरे यार! पहली दफा गर्लफ्रेंड बनाने जा रहे हैं और वो भी लबालब कॉन्फिडेंस के साथ। जेब में पैसे नहीं, और कॉन्फिडेंस गिराने के लिए, तुमने याद दिला दिया।"


"सर मेरे पास एक अचूक तरकीब है, गर्लफ्रेंड जरूर पटेगी। आप उसको एक रींग दे सकते हैं, लो बजेट वाला। खर्चा भी कम है और असर भी अच्छा रहेगा, मना वो कर ही नहीं पाएगी।"


"कब लौटाऊंगा पता नहीं, अगर उधारी दे सकती हो तो बताओ, पर उसके लिए भी बाद में फोन करना, अभी माफ़ करो।"


टॉं!


घड़ी देखूं आठ अट्ठाइस हो रहा है। अरे यार! तीन मिनट लेट हो गया। काश! आज कुछ मिनट लेट से ही गुजरे वो। आकर बेंच पर बैठ गया।


जैसे जैसे घड़ी में समय आगे बढ़ रहा है वैसे वैसे मेरा मन विचलित होता जा रहा है। देखते ही देखते गुस्से से भनभना आया मैं। करूं क्या, एक तो वो लड़की नहीं आ रही, क्या पता इस फोन कॉल के लिए मुझसे लेट हो गया हो और वो इतने में चली गई। .. सिंधु की तो खबर मैं उसी की दुकान पर आ कर लूंगा।


जबकि बात करते समय मैं कहीं रुका नहीं लगातार चल ही रहा था। पर इंसान की फितरत है कि अपनी किसी गलती को दूसरे के मत्थे मढ दो तो लगता है चार धाम कर लिया।


बहरहाल, वहीं पास चने परमल का एक ठेला लगा था। सोचा भूख भी लगी है, उसके आने तक टाइम पास भी हो जायेगा। एक एक चना मुंह में डालता गया।


"शायद कहीं वो चली तो नहीं गई। ह्म…..


उसकी क्या ग़लती वो भी बेचारी अपने दुकान मालिक के हुकम से ही फोन लगाई होगी, सिर्फ मुझे थोड़ी!? ऐसे जानें कितनों को.. पर इन दुकानदारों का भी कोई टाइम ठिकाना नहीं, कभी भी फोन लगा देते हैं। खैर… चना तो अच्छा है, कल फिर आऊंगा।


वैसे आज तो मैंने अपनी दाढ़ी बनवाई ही नहीं, अच्छा हुआ वो आई नहीं और उसने मुझे देखा नहीं, देखती तो क्या सोचती.. भिखारी कहीं का। कल पूरा सफाचट क्लिन सेव करा के आऊंगा। तू मेरी दूल्हन मैं तेरा दूल्हा..।" सोच कर वहीं बेंच पर उछल पड़ा।

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