इंतजार
लेखक-
रघुनन्दन महापात्र
"अरी!
तुम कब सोओगी"
"बस थोड़ी देर बाद, ये कुछ सिलाई बची है, तुम सो जाओ"
प्रभु! कल एक दिन अच्छा बीते, कह कर बूढ़ा गोविंद सो गया।
अभी वृंदा दो घंटे का काम लेकर बैठी है।
सवेरा
हुआ।
झटपट कुछ
निपटा कर गोविंद शहर जाने को तैयार हो गया है। इतने में आवाज़ आई..
"जाते
जाते भोलेनाथ के लिए भोग देते जाना पूजारी जी को, पन्नी में रख दिया है सिलबट्टे के
ऊपर वाले ताक में हैं"
"क्यों?
तुम नहीं जा रही आज?"
"कल
रात लम्बे समय तक लगातार बैठ गई, तो ऐसा लग रहा मानो कोई जालिम कमर की हड्डी पर लोहे
का कील ठोंक रहा है।"
"अच्छा!
आराम कर लो। मैं आते समय पीसी हुई हल्दी ले आऊंगा, इस बार नहीं पीसना पड़ेगा तुम्हें।"
"हाँ,
वो तुम्हारे भत्ते का भी पूछ आना, कब तक बढ़वा देंगे।"
"उसी
के लिए तो जा रहा हूं खास"
"अस्सी
के हुए आठ महीने हो गए, पहले से ये लोग करा देते तो आठ महीने के पाँच पाँच सौ ज्यादा
मिलते, अब अगर आना कानी करें तो पलथी मार बैठ जाना, जब काम कुछ आगे बढ़े तभी उठना बता
रही हूं।"
गोविन्द
चला।
वृंदा
अपने में फुसफुसा रही है, "ये महंगाई और इतनी सी पेंशन, कैसे घर चले, वो भगवान
बड़ा है कि मेरी सिलाई कुछ कुछ चल रही है। खैर हम लोगों का सुनने वाला कौन है। बेटा
हरिश! कब तक तेरे बाबूजी पैसे भेज पाएंगे। भगवान करें तेरी डिग्री जल्दी पूरी हो जाए
और कहीं तुझे काम मिल जाए तो मैं तेरी शादी करा के गंगा नहाऊं।"
"पाँच
साल होने को आया कोई खबर नहीं दी हरिश ने इस बारे में और ये लोग गरीब की मजबूरी पे
तनिक तरस नहीं खाते, बेचारे बुढ़े इंसान को आठ महीने से भगा रहे हैं। ऐसे में कहते
हैं झल्लाती हूं, बड़बड़ाती हूं।"
ताई! मैंने
बछड़े से दूर गाय को आंगन में बांध दिया है और ढोल के ऊपर घास भी रख दिया है। मैं चलता
हूं, आज मेरी सास आ रही है, माँ ने कहा है तुम भी आना दोपहर को।
हाँ, धरम!
आऊंगी, पर बेटा मेरी ये गाय और बछड़े दोनों को बेच दूं सोच रही हूं, अब तन में ताकत
नहीं बची कि इनको सम्हाल सकूं। देखना कोई ले जाए दोनों को अच्छे दाम में तो बताना।
इतनी भी
कमजोर कहाँ हुई हो ताई। ये लो ताऊजी आ गए। ठीक है मैं चलता हूं।
बाहर बरामदे
में चारपाई पर गोविन्द हाँपते हुए बैठ गया। निचे रखे लोटे से मुंह धो कर पानी पीया।
लेटने ही जा रहा था कि फिर उठ कर घर के भीतर चला गया।
वृंदा
पूछती है, "क्या हुआ इतनी जल्दी लौटे? काम हो गया?"
"नहीं,
हरिश की माँ। वो बाबू आज छुट्टी पर हैं, सोमवार को जाऊंगा, कह रहे थे कि सोमवार काम
हो जाएगा।"
"अच्छा
ठीक है। तुमको याद है? हरिश का पाँचवा साल इस नवरात्र को पूरा हो रहा है। कुछ बात हुई
उससे?"
"हाँ… हुई।"
"क्या
बात हुई? कब आ रहा है वो?"
"उसकी
डिग्री पूरी नहीं होगी अभी, काम तो रात दिन एक कर के कर रहा है पर और छह महीने लगेंगे
हो सकता है एक साल..।"
इतना कह कर गोविन्द एक लम्बी सांस छोड़ता है और वृंदा सामने टंगी कलेंडर में डूब जाती है।
Beautifully written
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