समकालीन कविता के परिप्रेक्ष्य में कवि केदारनाथ सिंह

लेखक- रघुनन्दन महापात्र

 

कवि केदारनाथ सिंह तीसरे सप्तक से लेकर के इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक तक लिखते रहे हैं। इनके लेखन का उत्तरार्ध समकालीन कविता के दौर का ही है। जिसमें वह युगीन परिप्रेक्ष्य में अपनी कविता को ढालते हैं। समकालीनता के अलग-अलग चेहरे हैं जिन्हें हम केदारनाथ सिंह की कविता में देखते हैं। समकालीन कविता के मज़बूत हस्ताक्षर केदारनाथ सिंह की कविता में मनुष्य के जीवन के भिन्न भिन्न पक्षों और अवस्थाओं की यथार्थ स्थिति भी सृजित होती है। ठंड़ में ठिठुरते बुढ़े की प्रार्थना से लेकर इन्सान की जिजीविषा तक और राजनीति से लेकर जनपदीय संस्कृति तक उसमें अभिव्यक्त होती है।

समकालीन कविता सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक हलचलों के प्रति चेतन कवि का अपने लोक और परिवेश के प्रति उत्तरदायित्व भरा सृजन जो दरअसल कष्ट झेलते लोगों की आवाज बनती है। जो जीवन-संघर्ष में मानव-मूल्यों और लोगों के दैनन्दिन जीवन के सरोकारों से सीधा जुड़ती है। समकालीन हिन्दी कविता का कैनवास इतना बड़ा है कि उसे किसी खास वाद, प्रवृत्ति या बोध से नहीं जोड़ा जा सकता। कई कारण समकालीन कविता के उभार के लिए स्पष्टतः जिम्मेदार नज़र आते हैं पर कोई एक निर्दिष्ट भेदक रेखा जिसके पीछे समकालीन (समकालीन हिन्दी कविता के संदर्भ में) नहीं था और जिससे आगे समकालीन है, ऐसा तय कर पाना अबतक संभव नहीं हो सका है। सामान्यतः यह आठवें दशक और उसके बाद की कविता है।

अरुण कमल के अनुसार- समकालीन कविता पर एक आरोप अक्सर लगाया जाता है कि वह फूल-पत्ति-चिड़िया-बच्चा की कविता है। यह आरोप एक अर्थ में सही है। एक बार फिर कविता ने मनुष्य के पूरे जीवन से, दैनन्दिन के कार्य-व्यापार और परिवेश से अपनी गहरी आसक्ति व्यक्त की....उसके अंतर में है वही गहरी रागात्मकता जो निराला की परवर्ति कविताओं में है और जो उनसे चलकर नागार्जुन-शमशेर-त्रिलोचन-रघुवीर सहाय-केदारनाथ सिंह आदि से होते हुए अभी की हिन्दी कविता में आती है।”(1) रोज़मर्रा की जिन्दगी में इन्सान फूल, चिड़िया यानी प्रकृति से जुड़ा हुआ ज़रूर है और समकालीनता के इस पक्ष को भी केदारनाथ सिंह अपनी कविता में शामिल करते हैं।

केदारनाथ सिंह का कविता-संग्रह यहाँ से देखो में एक कविता है सन् 47 को याद करते हुए। यहाँ एक शक्ति है जो इन्सानों के बीच उपस्थित है। इसमें किस तरह से राजनैतिक परिस्थितियों से हुए मुल्क का बटवारा दूरदराज गाँव के एक इन्सान की जिन्दगी, उसके रिश्ते तथा यादों पर असर डालता है वो इसका विषयवस्तु है। इस कविता में रूह कंपा देने वाले दृश्यों का चित्रण नहीं है, यहाँ बटवारे का वर्णन नहीं है। बटवारे का खौफनाक मंज़र नहीं है लेकिन एक सुदूर गाँव में उसकी गुंज सुनाई देती है, ज़हन में सालती रहती है उसकी याद। सहसा नूर मियाँ की याद आती है और एक बड़ा चित्र उभरने लगता है। कविता के दरमियान एक शब्द आखिर आता है। इसी शब्द के इर्दगिर्द पूरी कविता घूमती है। कविता के कुछ अंश-

तुम्हे याद है शुरू से आखिर तक

उन्नीस का पहाड़ा

क्या तुम अपनी भूली हुई स्लेट पर

जोड़ घटा कर

यह निकाल सकते हो

कि एक दिन तुम्हारी बस्ती को छोड़कर

क्यों चले गए थे नूर मियाँ

क्या तुम्हे पता है

इस समय वे कहाँ हैं

ढाका

या मुल्तान में

क्या तुम बता सकते हो

हर साल कितने पत्ते गिरते हैं पाकिस्तान में”(2)

 (सन् 47 को याद करते हुए)

अरुण कमल का ऐसा कहना कि यह कविता सिर्फ एक स्मरण है, जिसमें एक शब्दअखीर कविता की धुरी है। शब्दों के स्वभाव और गुणों की ऐसी कद्र बहुत थोड़े-से समकालीन कवि कर पाते हैं यह केदारजी की खासियत है, उनका मिजाज।”(3) बहुत ठीक है क्योंकि आवाज़ ऊँची किए बगैर आवाज़ बुलंद करना ही तो शब्दों का खेल है।

केदारनाथ सिंह की कविता में शहर का उजला पक्ष कम से कम दिखता है और वहीं गाँव के लिए आत्मीय भाव से चित्रण होता दिखता है। जनपद से गहरे भावनात्मक लगाव के होते वहाँ कभी कभी नास्टेल्जिया भी लग सकता है। गाँव में लोगों के बीच एक जुड़ाव होता है वहीं शहर में उस जुड़ाव का कहीं न कहीं अभाव देखने मिलता है।

आज की ये तल्ख़ हक़ीक़त है कि एक आम इन्सान तभी लोगों से मिलने बाहर निकलता है जब उसका दिन नहीं गुजरता। इस समकालीन दौर में ये एक कड़वी सच्चाई है कि इन्सान लोगों से कम ही सरोकार रखता है अधिकतर खुद में या अपने परिवार के दायरे में ही मगन रहता है और अपने ही आसपास के लोगों से अनजान रहता है। यह समकालीन जीवन के पैदा किए परायेपन का सूचक है। इस दौर में व्यक्ति असुरक्षा और परायेपन का एहसास कर रहा है इसलिए कि वह आज विश्वास, मित्रता और अपनापन जैसै मूल्यों का ह्रास होते लगातार साक्ष बन रहा है।

उत्तर कबीर और अन्य कविताएँ संग्रह में एक कविता हैगाँव आने पर इसमें कवि केदारनाथ सिंह ऐसे ही परायेपन या इन्सान को इन्सान से मिलने देने में एक कोई बाधक सा कुछ एहसास करते हैं और यहाँ उसका रेखांकन है-

पर किस तरह मिलूँ

कि बस मैं ही मिलूँ

और दिल्ली न आए बीच मैं”(4)

                                                                                (गाँव आने पर)

यहाँ इन्सान की आन्तरिक विस्थापन साफ पता चल रहा है। इस समकालीन दौर में ये व्यक्तित्व की एक सीमा है कि दिल्ली के संस्कार का लिबास उतारकर गाँववाला बन कर दूसरों से मिलने में मुश्किल पेश आता है।

केदारनाथ सिंह की कविता में राजनीति आती है मगर धीमी आँच की। कविता में राजनीति आशय में प्रकट होती दिखाई देती है। दलगत राजनीति का उदाहरण लगभग नहीं मिलता। जो स्वर रघुवीर सहाय की कविता में है वह केदारनाथ सिंह की कविता में नहीं मिलती है। केदार जी की कविता में वो मुखरता का अभाव है जो श्रीकान्त वर्मा की कविता में मौजूद है।  राजेश जोशी इस बारे में कहते हैं- कहना न होगा कि पचास के बाद आई नई कविता के कवियों में रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह ने ही राजनीति से साक्षात्कार के सबसे ज्यादा अर्थवान रास्ते तलाश किए हैं। केदारजी में शोषित-पीड़ित भारतीय जन के पक्ष में खड़े होने का स्पष्ट और आत्मीय संकल्प है और क्रिया के अर्थ को खोजने की गहरी ललक भी”(5) एक नमूना-

होंठों को बहुत कुछ चाहिए

उन्हें चाहिए हाँ का नमक

और ना का लोहा

और कई बार दोनों

एक ही समय।”(6)

(होंठ)

यहाँ से देखोकविता संग्रह में एक छोटी कविता हैदो मिनट का मौन। इस कविता में अबतक की सरकारों ने देश को किस तरह ठगा है उसका चित्रण है। सरकारों ने अब तक इस देश के साथ जो कर डाला है उसकी नाखुशी, जो अब तक भी नहीं कर सकी हैं उससे नाराज़गी और वो संभावनाएँ जिन्हें वे संभव न कर सकीं उनके प्रति दो मिनट का मौन रह कर जनता का दुःख ज़ाहिर किया है। उन तमाम योजनाओं पर जो कदाचित केवल सरकारी फाइलों तक ही रह गईं, उस कदाचित बेमतलब विकास पर जो इस शताब्दी में हुआ है तथा उन इरादों उन वादों पर जो कभी पूरे नहीं हुए एवं इन सब में हर बार हारती जनता पर दो मिनट का मौन। सरकोरों की जीत और जनता की हार पर दो मिनट को मौन। समकालीनता के इस पक्ष को उघाड़ती इस कविता के कुछ अंश-

जो है उस पर

जो नहीं है उस पर

जो हो सकता था उस पर

दो मिनट का मौन

हर योजना पर

हर विकास पर

दो मिनट का मौन

महान इरादों पर

महान शब्दों पर

और महान वादों पर

दो मिनट का मौन(7)

                                                                                          (दो मिनट का मौन)

राजेश जोशी कहते हैं- एक एशियाई समाज में जहाँ सड़क पर बैलगाड़ी और कार एक साथ मौजूद हों... वहाँ एक रचनाकार एक ही समय में मौजूद कई अलग-अलग समयों का समवर्ति होकर भी, या होकर ही समकालीन हो सकता है। कभी कभी लगता है कि हमारी समकालीनता कुछ उलझी हुई पहेली है। इसमें कबीर और 9/11 के बाद की रचना किसी खास क्षण में समकालीन हो सकते हैं।”(8) समसामयीक के साथ प्राचीन किन्तु प्रासंगिक चीजों का संगम भी केदारनाथ सिंह की कविता में दिख जाता है। कुछ पंक्तियाँ-

और बीजक का कोई पद

किसी पोथी से छिटककर

मनु से बहस कर रहा है

और रासो की कोई सबसे पुरानी प्रति

धीरे-धीरे गुनगुना रही है

किसी युवा कवि की अप्रकाशित कोई कविता(9)

                                                                                          (पांडुलिपियाँ)

 

इस दौर के इन्सान में जो जिजीविषा है, समस्या के हल के लिए किसी सरकार या अन्य की मदद की आस में बैठे न रह कर खुद के ही ऊपर भरोसा करना आदि समकालीन दौर के मनुष्य के अंदर की मानसिक शक्ति का द्योतक है। अरुण कमल का कहना है- टूटा हुआ ट्रक शीर्षक कविता जीवन के जिस उद्दाम वेग को अंकित करती है या पानी में घिरे हुए लोग शार्षक कविता जीवन के प्रति जिस तृष्णा को व्यक्त करती है, वह एक तरह से पूरे संग्रह (यहाँ से देखो) का ही सारांश है। केदार जी की इन कविताओं में जीवनी शक्ति की स्थापना हुई है। वह इनमें अपने विविध रूप में प्रगट हुई है।”(10) हर अच्छे कवि की कविता में जीवन तो होता है पर जीवन की स्थापना करना कुछ ही कवियों में देखा जाता है जिनमें से हैं केदारनाथ सिंह। एक ट्रक जो टूट गया है उसमें भी आशा बची है। जीवन शक्ति फिर संचारित हो रही है।

तालस्ताय और सायकिलसंग्रह में सरकार की विफलता और व्यर्थताबोध को रेखांकित करती है उनकी कविता आजादी की स्वर्ण जयन्ती जनता की ही आवाज है। एक कविता है अकाल में दूब जिसमें कृषक-जीवन के साहस और जुझारूपन से अवगत कराया गया है।

 

अंत में

साड़ी बस्ती छानकर

लौटता हूँ निराश

लाँघता हूँ कुएँ के पास की

सूखी नाली

कि अचानक मुझे दिख जाती है

शीशे कस बिखरे हुए टुकड़ों के बीच

एक हरी पत्ती

दूब है

हाँ हाँ दूब है-

पहचानता हूँ मैं(11)

 इसमें एक द्वन्द्व है; सच्चाई और संभावना के मध्य, जिसे एक उम्मीद भी कह सकते हैं। क्रम से सूखे के दर्दनाक मंज़र कई आते हैं कविता में मगर एक आशा भी है उसमें। ये उम्मीद खोखल नहीं है, इसमें एक कोशिश है एक तलाश है जो संभावना और संभव के बीच की दूरी को तय करेगा, अतिक्रमण करेगा। और अंततः दूब दिखती भी है भयंकर सूखे में।

                                                                                    

निष्कर्ष-

समकालीनता का शर्त ये है कि वह जनता की बुलंद आवाज़ बने और यथार्थ बेपरदा हो। इन विशेषताओं से सम्पन्न केदारनाथ सिंह की कविता समकालीन कविता के दायरे में आती हैं। सन् 47 को याद करते हुएमें बटवारे के बाद पाकिस्तान में बसे बिछड़े स्वजन की याद से सुदूर गाँव में रह रहे इन्सान के ज़हन में एक बड़ा चित्र उभरने लगता है जो उसको सालता रहता है। कहीं सामाजिकता का गिरावट का ऐसा आलम कि लोग लोगों को नहीं जानते, एक और अकालकविता में इस बिड़म्बना का जायजा लिया गया है। समकालीन दौर में उपजी आत्मनिष्ठता का संकट पहचाना गया है। शहर में रहने लगते हैं तो वो गंवईपन छूट जाता है। फिर उसके बाद जब गांव लौटते हैं तो वहां घुलना कठिन हो जाता है। गांव आने पर कविता में इसी के ही वर्णन है। सरकारों की नाकामी पर दो मिनट का मौन एक जबरदस्त कविता है, जिसमें विफल योजनाओं, अपूर्ण वादों तथा अब तक क्या किया और क्या क्या नहीं कर पाए उन नाकामियों को खामोशी से श्रद्धाञ्जली दी गई है। समकालीनता की कसौटी पर एकदम खरी उतरती उनकी कविताएँ केदारनाथ सिंह को निःसंशय समकालीन हिन्दी कविता का विविध स्वरों को शब्द देने वाला एक मज़बूत हस्ताक्षर बनाती हैं।

 

सन्दर्भ ग्रन्थ सूची -

1.      कविता और समय, अरुण कमल, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, आवृत्ति संस्करण 2014, पृष्ठ 22

2.      यहाँ से देखो, केदारनाथ सिंह, पृष्ठ 79

3.      कविता और समय, अरुण कमल, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, आवृत्ति संस्करण 2014, पृष्ठ 98

4.      गाँव आने पर, उत्तर कबीर और और अन्य कविताएँ, राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली, 1995, केदारनाथ सिंह, पृष्ठ 12

5.      एक कवि की नोटबुक, राजेश जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण 2004, पृष्ठ 82

6.      होंठ, अकाल में सारस, केदारनाथ सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पृष्ठ 24

7.      दो मिनट का मौन, यहाँ से देखो, केदारनाथ सिंह, राधाकृष्ण प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, चौथी आवृत्ति, पृष्ठ 15-16

8.      समकालीनता और साहित्य, राजेश जोशी, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण 2015, पृष्ठ 31

9.      आधुनिक एवं छायावादोत्तर काव्य संग्रह, संपादक- राकेश कुमार द्विवेदी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, पृष्ठ 230

10.  कविता और समय, अरुण कमल, वाणी प्रकाशन, नयी दिल्ली, आवृत्ति संस्करण 2014, पृष्ठ 99

11.  http://kavitakosh.org

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