बालपन
लेखक- रघुनन्दन महापात्र
छज्जे पर रंगों के डिब्बे
डिब्बों पर ये नज़र
आंखों से उसे टटोलते हुए,
सबसे छोटे को ढूँढते हुए
आंखों में उन छोटी छोटी सब्जी की क्यारियाँ
नज़र घूमाने दूर लम्बे रास्ते पर
कितनी ही कहानियाँ रचता
उपक्रम बनता फिर बिगड़ता
कभी कैरियाँ तोड़ने
कभी क्यारियों में पानी डालने
कभी बकरियों को पानी पिलाने
किसी बहाने दहलीज़ से आगे
दादी से छिपकर
देख ही लेता मुंडी निकालकर
रास्ता फिर खाली दिखता
फिर बड़ी बड़ी आंखें सिकुड़ जातीं
मुन्ना! बेटा बकरियाँ गिन कर बताना
सुनते ही दौड़ कर दादी तक पहुंच जाता
उसी फुर्ती से वापस
बकरी गिन कर दादी को बताता
डिब्बों में से सबसे छोटा
उठाकर पानी भर बाड़ी में डालता
ये कोमल तलवे
ये तपते फ़र्श
कोई तकरार नहीं दोनों शांत निश्चल
दोपहर की गर्मी
लू की वो हवा
बच्चे के हौसले के आगे दम तोड़ती
धूप ढ़लती
आंखें दौड़ती हैं दूर पलाश तक
कोई नहीं सब खाली सब खाली
हर बार मुट्ठी खोल कर देखता
एक बार हथेली को
एक बार फिर सुनसान रास्ते को
कुच नहीं
कुच बी नहीं, कुच बी तो नहीं
फिर वही
पर कुछ तो है
हथेली में वही सिक्का
रास्ता वही खाली
बस आंखें थोड़ी नम
मुस्कान थोड़ी फीकी
बावजू वो रुआँसा चेहरा
वही बच्चा
वही सिक्का
वही कोमल गुलाबी पांव
वही फुर्तीला दौड़
वही उत्साह
और वही खाली गली
बदला कुछ भी नहीं
बस एक सूरज और उसकी तपिश।

Nice Poetry
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