समकालीन कविता आलोचक अशोक वाजपेयी की आलोचना-दृष्टि
अशोक वाजपेयी की आलोचना-दृष्टि
प्रथम लेखक- रघुनन्दन महापात्र
सह लेखक- डॉ. मधुलिका बेन पटेल
आलोचना
साहित्य को समझने की कोशिश करने के साथ रचना में छिपे उन तत्वों का भी उद्घाटन
करती है जो सरल पाठकीय दृष्टि से स्पष्ट नजर नहीं आते। समकालीन आलोचना की मुख्य
प्रवृत्तियों में एक उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता है। समकालीन हिन्दी कविता की
गैर-सर्जनात्मक आलोचना के साथ साथ सर्जनात्मक कही जाने वाली आलोचना में भी वैचारिक
प्रतिबद्धता को देख सकते हैं। अशोक वाजपेयी कविता की कलात्मकता को ज़रूरी मानते हैं।
उनका कहना है, “शब्दों की इस सच्चाई के
अहसास ने कई बार निपट एकांत में भी सच्चाई, शब्दों के अलावा
सुरों या रेखाओं या मुद्राओं में भी उतना ही रसती-बसती है। मैं यह बराबर मानता रहा
हूँ कि कविता की संगीत, नृत्य, चित्र,
मूर्ति आदि से एक अटूट बिरादरी है और वे सब भी कविता का, कम-से कम मेरी कविता का, अनिवार्य पड़ोस हैं.....
कलाओं को सच्चाई का हिस्सा मानने का पूर्वाग्रह हमेशा ही जीवनदायी और सृजनक्षम रहा
है। जीवन और लोगों ने निराश किया हो कलाओं ने कभी साथ नहीं छोड़ा। वे हमारी
जिजीविषा का स्थायी स्थापत्य रही हैं।”1 कविता और उसके
कलात्मक पक्ष के इस सम्बन्ध को स्वीकार करने की वजह से उन्हें जमीन से जुड़े न
रहने के आरोप भी लगे हैं, लेकिन वह कहते हैं कि दूसरे कवि इस सम्बन्ध को माने अथवा
न माने उनका मानना है कि कविता का ताल्लुक कला से है।
कविता
में कलात्मकता की पक्षधरता की वजह से अशोक वाजपेयी को हिन्दी आलोचना में कलावादी कहा गया।
वाजपेयी इसका खंड़न नहीं करते और कला को कविता में संजोने की नई परम्परा शुरू करते
हैं। वह कविता आलोचना में विचार के माध्यम से आलोचना में प्रवेश नहीं करते वरन्
कविता के विश्लेषण के लिए उसके पाठ की विशिष्टता को अधिक महत्व देते हैं।
बतौर आलोचक अशोक वाजपेयी का नाम पूर्वग्रह पत्रिका के
सम्पादक होने से हुआ। उनकी कविता की समझ अज्ञेय के कविता चिन्तन से सम्बन्धित है।
अज्ञेय कवि होने के साथ साथ एक चिन्तक भी थे। वे कविता की सर्जना के संकटों से
जूझते हुए मौलिक चिन्तन का विकास करते हैं। उनके इसी चिन्तन ने आनेवाली आलोचना को
कई सूत्र दिए। अशोक वाजपेयी स. ही. वा. अज्ञेय की उसी चिन्तन-धारा के आलोचक हैं।
सन् 70 के बाद हिन्दी कविता में कविता को अपनी काव्यात्मकता को सहेजने की मांग
उठने लगी। कविता में उस वक्त जो बदलाव घटित हो रहे थे वो तब की कविता की
नकारात्मकता के अति-प्रचार के विरुद्ध कवियों की नई रुख का भी नतीजा था। कविता ने
मानवीयता और सर्जनात्मकता की आवश्यकता को भी समझा। समय की मांग थी कि कविता अपनी
रचनात्मकता के जरिए सकारात्मकता फैलाए। इस प्रकार कवियों और आलोचकों ने कविता में
कविताई की पुनःप्राप्ति पर ध्यान दिया। अशोक वाजपेयी इस बदलाव का समर्थन करते हैं
और इसको ‘कविता की वापसी’ कहते हैं।
इसके बाद अशोक जी की कविता में कलात्मकता के प्रति आग्रह
संकीर्णता का पर्याय बनता चला जाता है। परिवर्तित स्थिति में कविता की भाषा और
स्वरूप के बारे में अशोक जी ज़रूरी गम्भीरता दिखाते हैं। कविता के इन पहलुओं की
अनदेखी से केवल तुकान्त करने वाले और केवल वर्णन करने वाले भी कवि कहलाने लग गए।
अशोक जी के स्वरूप को लेकर उठाए गए स्वर का प्रभाव समकालीन कविता पर पड़ा। कविता
में यह ज़रूरी है कि वह समय के अनुसार अपनी सम्वेदना और अभिव्यक्ति को भी ढाले।
अशोक जी का आलोचनात्मक सरोकार इस मुद्दे से सम्बन्धित है। वे कविता की विशेषता को
उसकी कलात्मकता में देखते हैं। वह कविता के सम्बन्धों और उसकी कलाओं के साथ साथ
उसकी गरिमा को बनाए रखना चाहते हैं।
अशोक जी की पहली आलोचना किताब ‘फिलहाल’ (1970) नई कविता के अवसान और नई
प्रवृत्तियों के आगमन के समय में प्रकाशित हुई। इसमें नई कविता के बाद की कविता के
विषय में नवीन वैचारिक प्रतिरोध की भूमिका पर विचार करने की कोशिश देखी जा सकती
है। बतौर नए आलोचक वाजपेयी जी इस किताब में मूल रूप से तत्कालीन युवा कविता की कुछ
ज़रूरी बातों को उठाने में सफल हुए हैं। यह किताब कविता की परवर्ती पीढ़ी और
आनेवाली सम्भावित समस्याओं का ज़िक्र है। वह लिखते हैं- “इस पुस्तक के मूल में मेरी यह
धारणा है, और जहाँ तक बन पड़ा है, मैंने समकालीन कविता को समझने-बूझने और इस समझ
से हमारे समय के मनुष्य की हालत के बारे में अपने अहसास को प्रासंगिक और गहरा करने
की कोशिश है।”2 वाजपेयी जी समकालीन कविता की समझ
और उसका आधार बनाने में आलोचकों के एक नेतृत्वकर्ता के रूप में अपनी भूमिका निभाते
हैं। सम्पादक के रूप में भी वह अपनी मज़बूत उपस्थिति दर्ज करते हैं। ‘फिलहाल’ को समकालीन कविता की आरम्भिक
भावधारा और प्रवृत्तियों की पीठिका माना जा सकता है। इस पुस्तक के तीन खण्ड हैं।
प्रथम खण्ड में कविता की बदलती दिशा और उसके संक्रमण को समझने की कोशिश है।
द्वितीय भाग में कविता काल के मूलभूत प्रश्नों को कवियों के माध्यम से वाजपेयी जी
उठाते हैं। तृतीय भाग में कविता से सम्बन्धित कुछ और महत्वपूर्ण प्रश्न को समझने
की कोशिश करते हैं। वतौर आलोचक अशोक वाजपेयी की ज्यादातर किताबें सन् 2000 के बाद
आईं। उन किताबों में उऩ्होंने अपना ध्यान संपादन पर
अधिक रखा। उन्होंने विदेशी कविताओं से हिन्दी कविता को परिचित कराने का काम किया।
पूर्वग्रह और बहुवचन का सम्पादक रहते हुए मार्क्सवादी और
जनवादी आलोचना की मौजूदगी में कविता की कलात्मकता और उसकी कविताई की बात करने के
कारण अशोक वाजपेयी अधिक महत्वपूर्ण हैं।
अशोक वाजपेयी की नज़र में अन्य कलाओं की जैसी कविता भी एक
श्रमसाध्य कलात्मक प्रक्रिया है। इनकी और आलोचना पुस्तकें हैं, ‘कुछ पूर्वग्रह’, ‘समय से बाहर’, ‘कविता का गल्प’, ‘सीढ़ियाँ शुरू हो गई हैं’, ‘कवि कह गया है’, ‘पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज’, ‘कभी-कभार’ और ‘बहुरि अकेला’। इनकी आलोचना में कविता की समकालीनता और उसकी दिशा को लेकर सवाल अधिक
महत्वपूर्ण हैं।
कविता
के प्रति अशोक जी की सतर्कता कविता के उन पक्षों के प्रति नवीन दृष्टि के आविष्कार
की आवश्यकता पर ध्यान देती है जो हाशिए पर हैं। “कविता सच या किसी महान अनुभव की
तलाश है या नहीं, मैं नहीं जानता। पर इतना तय है कि कवि कविता के माध्यम से भाषा
के संयोजन से अपनी जगह की तलाश करता है। उसे अस्तित्व, मानवीय स्थिति, नियति,
उपस्थिति और अनुपस्थिति, नश्वरता के प्रश्न उलझाते हैं। इस उलझाव के बिना कोई
सार्थक तलाश मुमकिन नहीं। जो कविता इन प्रश्नों से अपने को अलग रखती है, उसे अपनी
जगह न समझ में आ सकती है, न ही अन्ततः मिल सकती है।”3
अशोक जी की आलोचना में कविता को कलात्मकता से जोड़ के देखने
का पक्ष स्पष्ट पता चलता है। उन्होंने इस बात को माना भी है, “यह ज़िद है कि साहित्य को उसकी
वैचारिक सत्ता में, अपनी कलात्मक
अद्वितीयता में और अपने सच में ही समझा जा सकता है, किसी दूसरे का उपनिवेश बनाकर या
किसी और मोर्चे पर नहीं।”4 इसके बावजूद वह कविता अपनी परिसीमा में अधिक से अधिक
विषयों को, शैलियों को, विविधताओं को समेटने के पक्षधर लगते हैं। वह इस बात को
स्वीकार करते हैं कि कविता का अत्यावश्यक सरोकार समाज से है। “कविता कहीं न कहीं जीवन को बचाती
है। कई बार लगता है कि कविता वही लोग लिखते और पढ़ते हैं जो जीवन में सिर्फ रस
नहीं लेना चाहते बल्कि उसमें कुछ बचाना चाहते हैं। यह समझ तो बाद में ही आती है कि
पल-पल हमारा जीवन नष्ट भी हो रहा हैः लेकिन उसका कुछ है जो इस निरन्तर नाश से बचा
ओर मुक्त रह सकता है। कविता ऐसी मुक्ति, ऐसा बचाव है।”5
‘पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज – एक
कवि-आलोचक के आत्मवृत्त’ को अशोक जी के रचना संसार का दस्तावेज़ कह सकते हैं। इसमें वे अपनी सृजनात्मक
विचार और अपने साहित्य के आधार की उपयोगीता को स्पष्ट करने की कोशिश करते हैं। दो
भागों में लिखी इस किताब के प्रथम भाग में ‘अपने बहाने’ उपशीर्षक में अशोक वाजपेयी की
रचनात्मक यात्रा और चिन्तन का बयान है। किताब के दूसरे भाग में बातचीत और
साक्षात्कारों का संकलन है। कविता के खुद की चिन्ताओं की वजहों पर भी आलोकपात करते
हैं। अशोक वाजपेयी की सृजन यात्रा में कई प्रश्न और मुद्दे उन पर आरोप के जैसे लगे
हैं। उन आरोपों पर इस पुस्तक में उन्होंने विचार किया है। उनके विचार में कविता की
उदात्तता को बनाए रखने के लिए उसकी भाषा और उसके रूप की अनिवार्य भूमिका है। कविता
की भाषा और शिल्प के विषय में अशोक वाजपेयी की गम्भीरता का कारण कविता का
अप्रासंगिक होते जाना, लोगों से दूर होते जाना है। इस कारण से उनको फार्म का कवि
भी कहा जाता है। कविता में भाषा और शैली पर उनका कहना है, “कविता में शब्द का अतिजीवन मुझे
हमेशा से चकित करता रहा है। कविता के अपने परिसर में शब्द सिर्फ रसते-बसते भर नहीं
हैं- वे अक्सर दूसरे शब्दों को पुकारते हैं। वे अपने पूर्वज शब्द को लम्बी नींद से
जगाते हैं, किसी नए शब्द का जन्म उल्लसित होकर निहारते हैं। शब्द हमारे होने का
सबसे अदम्य अनुष्ठान हैं, एक निरन्तर उत्सव हैं। कविता का एक काम, कम-से-कम मेरी
इस कविता का एक काम, इस अनुष्ठान, इस उत्सव को अपने गठन में सम्भव बनाने का रहा
है।”6 हिन्दी कविता में शब्द और भाषा के
लिए इनकी सजगता का एक कारण समकालीन कविता में लगातार भाषा और शिल्प का क्षरण भी
है। अशोक वाजपेयी के लिए कविता में भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम भर नहीं है बल्कि
शब्दों के ज़रिए अभिव्यक्ति के गुंफित अर्थों जिसमें भाषा की सांस्कृतिक संपदा,
उसका इतिहास और वर्तमान सबको खोल दिया जाता है। इस प्रकार भाषा कविता को
अभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम बनाती है। कविता में भाषा के माध्यम से ही जीवन को
प्रस्तुत किया जाता है। कविता के ज़रिए कवि उन सच्चाईयों, अनुभूतियों को पाठक के
समक्ष प्रस्तुत करता है जो अभी तक नहीं हुआ था। कविता समय में इस प्रकार से भाषा
के माध्यम से हस्तक्षेप करती है।
उनकी कुछ रचनाएँ हैं, ‘कुछ पूर्वग्रह’, ‘समय से बाहर’, ‘कविता का गल्प’, ‘सीढ़ियाँ शुरू हो गई हैं’, ‘कवि कह गया है’ और ‘कभी-कभार’ हैं। कवि इनमें इन्हीं
हस्तक्षेपों की उपादेयता को अपने तथा अन्य कवियों के सृजनात्मक संघर्ष के
परिप्रेक्ष्य में समझाते हैं। अशोक जी की आलोचना सृजनात्मक हस्तक्षेप के महत्व, उसकी उपयोगिता से
संबंधित विचार और चिन्तन को समझने की कोशिश करती है। इसी कारण से वे किसी
विचारधारा के पक्षपाती नहीं हैं। “अशोक वाजपेयी का रचना-कर्म किसी एक सुचिंतित और अन्तिम मान लिए गए विचार अथवा
विचारधारा का प्रतिरोधी कर्म है। विचारधारा हो या व्यक्ति, एक लोकतान्त्रिक स्पेस
में किसी का भी एकमेव वर्चस्व साफ तौर पर अधिनायकवादी एजेंडे के अन्तर्गत आता है,
चाहे वह जितने रूप बदले, जिस किसी शक्ल में सामने आए, अशोक उससे सहमत नहीं। कविता
का काम किसी एक विचार या विचारधारा की सेवाटहल करना नहीं है।”7
कविता की आलोचना में अशोक वाजपेयी इसी कारण से समकालीन दौर
में एक नवीन प्रतिपक्ष को खड़ा करने में सफल होते हैं जिसके आधार में कविता की
रचनात्मकता का संरक्षण महत्वपूर्ण है। कविता एक पक्ष में खड़ी नहीं होनी चाहिए
क्योंकि उसे एक मजबूत प्रतिपक्ष को खड़ा करना है। कविता आलोचना से अशोक जी को यह
शिकायत रही है कि उसने वर्चस्ववादी अकादमिक संस्था को स्थापित करने की कोशिश की।
इसलिए कविता और आलोचना दोनों का नुकसान हुआ। वह पूछते हैं “क्या धीरे-धीरे आलोचना एक
प्रतिष्ठान का रूप लेती जा रही है जिसके लिए साहित्य के प्रश्न शक्ति-संतुलन के
प्रश्न बनते जा रहे हैं?”8 अशोक वाजपेयी उन कवियों के योगदान पर आलोकपात करते हैं
जिन्होंने कविता को नई राह और जिवंतता दी। ‘कविता के तीन दरवाजे’ में अज्ञेय, शमशेर और मुक्तिबोध
के ज़रिए कविता के तीन वरपुत्रों की बात करते हैं जो कविता को समझने के तीन
अलग-अलग नजरिए का सृजन करते हैं। इन तीनों की सृजनात्मक अभिव्यक्ति भिन्न भिन्न
हैं मगर तीनों में कविता का दिशा-निर्धारण और उसकी समझ को बनाने की शक्ति है। एक
साथ तीन धाराओं के कवियों पर विचार करते हैं, यह उनकी कविता में जनतान्त्रिकता को
बरकरार रखने की कोशिश है। वो कहते हैं, “अंततः हम सामान्य और सरलीकृत की तानाशाही या सर्वसत्तावादी के बरक्स एक
बहुलतावादी दृष्टि की वकालत करते हुए आज की कविता में खरी और जीवनधर्मी जटिलता,
वैचारिक स्वायत्तता और बौद्धिक दृढ़ता। सृजनात्मक शब्द की और उसके माध्यम से जीवन
की प्राथमिकता, भाषिक पर्यावरण की रक्षा, सच्चाई से अपने वास्तविक जटिल संबंध की
पहचान का आग्रह कर रहे हैं।”9
कविता आलोचना से अशोक वाजपेयी की अपेक्षा उसी अपेक्षा का
अंश है जो कविता में जीवन को बचाए रखने का पक्षधर है। “आलोचना का काम सिर्फ पहले के या
उसके समकालीन रचनाओं का विश्लेषण, मूल्यांकन, प्रवृत्ति निर्धारण भर नहीं है उससे
कहीं आगे जाकर उसकी जिम्मेदारी है समकालीन समाज में रचना के लिए जगह बनाना। उसकी
स्वतंत्रता, उसकी स्वायत्तता के लिए संभावना बनाए रखना। उन शक्तियों से लोहा लेना
भी जो साहित्य का शोषण करती हैं या करना चाहती हैं। चूंकि आलोचना एक वैचारिक
प्रक्रिया भी है, उसकी एक ज़िम्मेदारी साहित्य और
विचारों के बीच संबंध खोजना और स्थापित करना है- साहित्यिक विचार या
साहित्य-सिद्धांतों को सिद्धांतजगत में उचित स्थान और मान्यता दिलाना भी है, सबसे बढ़कर साहित्य को वैचारिक संवाद में अवस्थित करना और
उसे वहाँ लगातार बनाए रखना है।”10
‘पूर्वग्रह’ पत्रिका के बतौर सम्पादक वह संवाद
वैठक करते रहे और पत्रिका में भी सभी विचारों को जगह देते रहे। उनके संपादन में आई
किताब ‘कविता का जनपद’ में ‘पूर्वग्रह’ पत्रिका में प्रकाशित आलेखों का
संकलन है। इसमें समकालीन कविता के बहस में शामिल कवि आलोचकों के विचार जानने मिलता
है।
अशोक वाजपेयी समकालीन कविता के बहुचर्चित आलोचक रहे। वे
समकालीन आलोचना में कई जरूरी बहसों को, चर्चाओं को सामने लाए। कलात्मकता और कविता
के सह-संबंधों पर उनके विचार ने कविता की भाषा और उसके रूप के प्रति सतर्कता की ओर
कवि और आलोचकों का ध्यान आकर्षित किया। अशोक वाजपेयी की आलोचना का एक प्रमुख
बिन्दु सर्जना की चिन्ता है। कवि-आलोचक के तौर पर वह आलोचना की नई ज़मीन तलाशने की
कोशिश भी करते हैं। अशोक वाजपेयी समकालीन कविता के शुरुआती दौर से इक्कीसवीं सदी
के आरम्भ तक समान रूप से सक्रिय रहे। समकालीन आलोचना के अध्ययन के लिए वाजपेयी जी
के चिन्तन को समझना ज़रूरी है।
संदर्भ-
1.
अशोक वाजपेयी, पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज, पृष्ठ 20
2.
अशोक वाजपेयी, फिलहाल, पृष्ठ 09
3.
पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज, अशोक वाजपेयी, पृष्ठ 34
4.
सीढ़ियाँ शुरू हो गई हैं, अशोक वाजपेयी, भूमिका
5.
पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज, अशोक वाजपेयी, पृष्ठ 15
6.
पाव भर जीरे में ब्रह्मभोज, अशोक वाजपेयी, पृष्ठ 33
7.
कविता का अशोक पर्व, प्रकाश, पृष्ठ 17
8.
सीढ़ियाँ शुरू हो गई हैं, अशोक वाजपेयी, पृष्ठ 23
9.
कविता का गल्प, अशोक वाजपेयी, पृष्ठ 21
10.
सीढ़ियाँ शुरू हो गई हैं, अशोक वाजपेयी, पृष्ठ 14

Very insightful piece of work. Commendable.
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